नई खोज: जीन एडिटिंग में क्रांति लाने वाला vPE एंज़ाइम | कम गलतियाँ, ज़्यादा सटीक इलाज
MIT वैज्ञानिकों ने vPE नामक नया एंज़ाइम विकसित किया है जो जीन एडिटिंग की गलतियों को बेहद कम करता है। यह खोज आनुवंशिक बीमारियों और भविष्य की दवाओं के लिए नई उम्मीद है।
INNOVATION


नई खोज: ऐसी एंज़ाइम जो जीन एडिटिंग की गलतियाँ कम कर सकती है
परिचय
आज विज्ञान इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है कि जिन बीमारियों को पहले “लाइलाज” कहा जाता था, उनके इलाज की उम्मीदें अब दिखाई देने लगी हैं। इनमें सबसे बड़ा योगदान है जीनोम एडिटिंग (Genome Editing) का।
जीनोम एडिटिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसमें वैज्ञानिक हमारे डीएनए यानी जीवन की किताब के अक्षरों को बदल सकते हैं। अगर किताब में गलत शब्द है तो उसे सही किया जा सकता है। लेकिन समस्या यह है कि जब हम ये बदलाव करते हैं तो कभी-कभी अनचाही गलतियाँ भी हो जाती हैं।
ताज़ा शोध में वैज्ञानिकों ने एक नई किस्म की engineered enzyme बनाई है, जो इन गलतियों को बहुत कम कर देती है। यह खोज आने वाले समय में दवा और इलाज की दुनिया में क्रांति ला सकती है।
डीएनए और जीन एडिटिंग को सरल भाषा में समझें
हमारे शरीर की हर कोशिका में एक लंबा धागे जैसा स्ट्रक्चर होता है, जिसे डीएनए कहते हैं। इसमें अरबों “अक्षर” (A, T, G, C) लिखे होते हैं। यही अक्षर तय करते हैं कि हमारी आंखें कैसी होंगी, बालों का रंग कैसा होगा और हमें कौन-सी बीमारियाँ हो सकती हैं।
अब सोचिए, अगर इस किताब में टाइपिंग की गलती हो जाए — जैसे “राम” की जगह “रम” लिखा हो — तो अर्थ बदल जाता है। ठीक वैसे ही, डीएनए में गलती आने से कई बीमारियाँ हो जाती हैं।
यहीं पर जीन एडिटिंग की ज़रूरत पड़ती है। यह तकनीक उन गलत अक्षरों को मिटाकर सही अक्षर लिख देती है।
पुरानी तकनीक: CRISPR-Cas9
करीब दस साल पहले वैज्ञानिकों ने CRISPR-Cas9 नाम की तकनीक विकसित की। इसे आप “आणविक कैंची” (molecular scissors) मान सकते हैं। यह डीएनए को काटकर गलत हिस्से को हटाती और नया हिस्सा जोड़ देती है।
लेकिन इस तकनीक में एक दिक़्क़त थी। जब यह डीएनए को काटती थी, तो कभी-कभी ज़रूरी हिस्से भी कट जाते थे। यानी सही करने के साथ-साथ नई गलतियाँ भी पैदा हो जाती थीं।
नया विकल्प: Prime Editing
बाद में वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक बनाई, जिसका नाम है Prime Editing।
यह ऐसी कैंची है जो डीएनए को हल्का सा “nick” यानी छोटा कट लगाती है और फिर गाइड आरएनए की मदद से सही अक्षर लिख देती है। इससे बड़ी गलतियाँ कम हो गईं।
लेकिन Prime Editing में भी एक दिक़्क़त बची रही — कभी-कभी डीएनए में अतिरिक्त टुकड़े जुड़ जाते थे या सही टुकड़े हट जाते थे। इनको कहा जाता है indel errors (Insertion-Deletion errors)।
MIT की नई खोज: engineered enzymes
अब MIT (Massachusetts Institute of Technology, अमेरिका) के शोधकर्ताओं ने Prime Editing को और बेहतर बनाने का तरीका खोज लिया है। उन्होंने Cas9 एंजाइम को थोड़ा बदला और नया वर्शन बनाया।
इस नए वर्शन को उन्होंने नाम दिया vPE (very Precise Prime Editor)।
इसमें क्या खास है?
यह एंजाइम डीएनए को बहुत नियंत्रित तरीके से काटता है।
यह पुराने स्ट्रैंड (पुराना डीएनए हिस्सा) को धीरे-धीरे कमज़ोर करता है ताकि नया हिस्सा अच्छे से जुड़ सके।
इससे गलतियाँ यानी indels बहुत कम हो जाती हैं।
नतीजे कितने बेहतर हुए?
वैज्ञानिकों ने पाया कि:
पुराने तरीक़े में हर 7 एडिट पर 1 गलती हो जाती थी।
अब नए vPE एंजाइम से यह अनुपात 1:100 से भी बेहतर हो गया।
कुछ मामलों में तो 500 से ज़्यादा एडिट करने पर ही 1 गलती पाई गई।
यानी अब एडिटिंग लगभग 60 गुना ज़्यादा सटीक हो गई है।
सरल उदाहरण
मान लीजिए आपके पास बच्चों की किताब है जिसमें लिखा है –
“राम खेल रहा है”।
लेकिन प्रिंटिंग में गलती से लिखा आ गया –
“रम खेल रहा है”।
अब आपको यह गलती ठीक करनी है।
पुरानी तकनीक (CRISPR-Cas9) पूरी लाइन काटकर नई लाइन लिख देती थी। इसमें सही शब्द भी कट जाते थे।
Prime Editing सिर्फ़ “रम” को बदल देती थी, लेकिन कभी-कभी “खेल” का आधा हिस्सा भी मिट जाता था।
नई तकनीक (vPE) सिर्फ़ वही शब्द ठीक करती है और बाकी लाइन ज्यों की त्यों रहने देती है।
क्या होगा इस खोज का फायदा?
ज़्यादा सुरक्षित इलाज – अब जब गलतियाँ कम होंगी, तो मरीज़ पर दुष्प्रभाव का खतरा भी कम होगा।
नई बीमारियों का इलाज – आनुवंशिक बीमारियाँ (जो परिवार से चलती हैं), खून की गड़बड़ियाँ और यहाँ तक कि कुछ कैंसर भी इससे ट्रीट किए जा सकते हैं।
भविष्य की दवाओं का रास्ता – आने वाले समय में जीन थैरेपी ज़्यादा भरोसेमंद होगी।
अभी चुनौतियाँ भी हैं
ये तकनीक अभी ज़्यादातर लैब और जानवरों पर आज़माई गई है। इंसानों पर इस्तेमाल से पहले लंबे ट्रायल होंगे।
दवा को शरीर के सही हिस्से तक पहुँचाना अभी भी मुश्किल है।
लागत ज़्यादा है, इसलिए इसे आम जनता तक पहुँचाने में समय लगेगा।
नैतिक सवाल भी उठेंगे — क्या जीन एडिटिंग से सिर्फ बीमारियाँ ठीक की जानी चाहिए या और चीज़ों (जैसे कद, रंग, बुद्धि) में बदलाव की अनुमति होगी?
निष्कर्ष:
विज्ञान लगातार आगे बढ़ रहा है। CRISPR से शुरू हुआ सफ़र अब vPE तक आ पहुँचा है। यह दिखाता है कि इंसान ने अपने डीएनए की किताब को पढ़ना और सुधारना कितनी गहराई से सीख लिया है।
अगर सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले 10-15 सालों में हम ऐसी दुनिया देख सकते हैं जहाँ कई आनुवंशिक बीमारियाँ इतिहास बन जाएँगी।
प्रकाशित शोध
शोध का नाम: Engineered prime editors with minimal genomic errors
शोधकर्ता: विकाश पी. चौहान, फिलिप ए. शार्प, रॉबर्ट लैंगर और उनकी टीम
प्रकाशित पत्रिका: Nature (सितंबर 2025)
स्रोत साइट: MIT News
Disclaimer
यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।

