CDSCO का बड़ा कदम: सह-ड्रग नियंत्रकों को मिले अधिक अधिकार, अब नई दवाओं की मंजूरी होगी और तेज

भारत के राष्ट्रीय दवा नियामक संस्थान CDSCO ने सह-ड्रग नियंत्रकों (Joint Drug Controllers) को नई दवाओं, आयात लाइसेंस और क्लीनिकल ट्रायल साइट्स की मंजूरी देने के अधिकार सौंपे हैं। यह बदलाव दवा अनुमोदन प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और अधिक जवाबदेह बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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ASHISH PRADHAN

11/1/20251 min read

CDSCO और DCGI अधिकारियों की बैठक की प्रतीकात्मक तस्वीर
CDSCO और DCGI अधिकारियों की बैठक की प्रतीकात्मक तस्वीर

परिचय

भारत के राष्ट्रीय दवा नियामक संस्थान Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) ने कार्यालय आदेश जारी कर यह घोषणा की है कि अब Drugs Controller General of India (DCGI) के अधीन आने वाले “सह-ड्रग नियंत्रक” यानी Joint Drug Controllers (India) को नई ड्रग्स के आयात लाइसेंस, मानव उपयोग के लिए दवाओं के लाइसेंस, रक्त-स्टेम-सेल उत्पादों के लाइसेंस तथा क्लीनिकल ट्रायल्स के नए साइट्स की स्वीकृति देने का अधिकार सौंपा जा रहा है।

यह बदलाव 1 नवंबर 2025 को सार्वजनिक हुआ था और भारत के पूरे दवाओं तथा चिकित्सकीय उत्पादों के नियंत्रक ढांचे को प्रभावित करेगा।

यह कदम उस तथ्य को दर्शाता है कि भारत सरकार और CDSCO, भारत की दवा-अनुमोदन प्रक्रिया को सरल और तेज बनाने की दिशा में गंभीर हैं; क्योंकि अब केंद्रीय प्राधिकरण के शेयर किए गए अधिकार से अनुमोदन प्रक्रिया में लगने वाला समय कम होने की संभावना है।

इस लेख में हम इस फैसले के पृष्ठभूमि, कारण-परिणाम, चुनौतियों तथा उद्योग-दृष्टि से उसके प्रभाव की विवेचना करेंगे।

समस्या की पृष्ठभूमि: क्यों यह बदलाव आवश्यक था?

भारत में दवा-अनुमोदन प्रक्रिया लंबे समय से एक जटिल एवं समय-साध्य प्रक्रिया रही है।

विशेष रूप से तब जब कंपनियों को नए क्लीनिकल ट्रायल साइट्स खोलने, आयात लाइसेंस लेने या गंभीर प्रतिकूल अनुभव (SAE — Serious Adverse Events) से जुड़ी जिम्मेदारियों का सामना करना हो।

इस तरह की देरी का असर सिर्फ वाणिज्यिक दृष्टि से नहीं बल्कि रोगियों तक नई दवाओं की पहुँच तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता रहा है।

भारत में भारी तादाद में जनसंख्या है, चिकित्सकीय चुनौतियाँ जटिल हैं—मधुमेह (diabetes), मोटापा (obesity) जैसे रोग बड़ी संख्या में फैले हुए हैं। इन रोगों के आधुनिक उपचारों, जैसे “weight loss injection”, “liraglutide benefits”, “obesity drug”, इत्यादि  की बढ़ती मांग को देखते हुए समय-बद्ध एवं वैज्ञानिक अनुमोदन प्रक्रिया की आवश्यकता और बढ़ गई है।

उन दवाओं के लिए जिनमें नए तंत्र (mechanism) प्रयोग में लाए जाने हैं या संयुक्त क्लीनिकल ट्रायल्स की जरूरत है, वहाँ तेजी से निर्णय लेने का दबाव है।

इसलिए CDSCO द्वारा सह-नियंत्रकों को अधिक अधिकार देने का निर्णय इस पृष्ठभूमि में आया है, ताकि अनुमोदन प्रक्रिया में ‘ग्लास धीमा’ बनने की शिकायत कम हो सके।

नए निर्णय में क्या-क्या शामिल है?

इस नवीन आदेश के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख प्रावधान सामने आए हैं:

सह-ड्रग नियंत्रकों को मानव उपयोग की दवाओं के लिए आयात लाइसेंस जारी करने का अधिकार दे दिया गया है।

रक्त-स्टेम-सेल उत्पादों (blood stem cell products) के लाइसेंस और नए क्लीनिकल ट्रायल साइट्स की स्वीकृति देने का अधिकार अब उनसे जोड़ा गया है।

गंभीर प्रतिकूल घटनाओं (death, persistent disability) से जुड़ी क्लीनिकल ट्रायल्स एवं BA-BE अध्ययन के संबंध में मुआवजे (compensation) का निर्णय लेने की शक्ति भी साझा की गई है।

इस निर्णय का उद्देश्य सिर्फ अधिकार बाँटना नहीं बल्कि निर्णय-प्रक्रिया को तेजी, पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में ले जाना है। एक वरिष्ठ नियंत्रक के अनुसार: “delegation of powers … enables faster approvals … reducing delays and improving regulatory efficiency.”

यह कदम भारत सरकार के “Ease of Doing Business” और “Make in India” जैसे एजेंडों के अनुरूप भी बताया गया है।

अब प्रश्न उठता है कि‍ इससे कैसे लाभ होंगे?

  1. प्रविष्टि समय में कमी: अब हर मामले में DCGI के पास पूरी प्रक्रिया न जाकर सह-नियंत्रकों खुद निर्णय ले सकेंगे, जिससे आवेदनों का प्रतिक्षा-समय कम होगा।

  2. उद्योग-विश्वास में वृद्धि: दवा तथा बायोटेक कंपनियों को पता होगा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया केंद्रीकृत नहीं होने वाली, अधिक गति तथा स्थानिक-स्वीकृति संभव है, जिससे निवेश-परिस्थिति बेहतर होगी।

  3. रोगियों को जल्द लाभ: नई दवाओं, या आयात-दवाओं को भारत में जल्दी उपलब्ध कराना संभव होगा—जिन रोगों में अभी तक विकल्प सीमित थे (उदाहरणतः obesity, diabetes में weight-loss injections) वहाँ तेजी से विकल्प मिल सकते हैं।

  4. जवाबदेही एवं पारदर्शिता: जब सह-नियंत्रकों को अधिकार दिए गए हैं, तो यह उम्मीद है कि निर्णय-प्रक्रिया और जिम्मेदारी बाँटी जा सकेगी, भ्रष्टाचार-रोकथाम में भी मदद मिलेगी।

किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है?

हालाँकि यह बदलाव स्वागत योग्य है, पर कुछ जोखिम-और-चुनौतियाँ भी सामने हैं:

सह-नियंत्रक को दिए गए अधिकारों के साथ प्रशिक्षण, मानकीकरण, और डाटा-आधारित निर्णय लेने की क्षमता सुनिश्चित करना आवश्यक है। यदि फैसले जल्दी हों पर गुणवत्ता और सुरक्षा कमज़ोर हों तो परिणाम उलटे पड़ सकते हैं।

भारत में राज्य-स्तरीय ड्रग कंट्रोल अथॉरिटीज (State Drug Control Authorities) और केंद्र के बीच समन्वय की समस्या रही है। इस नए ढांचे में इस समन्वय का प्रबंधन एक चुनौती रहेगा।

भरोसेमंद क्लीनिकल ट्रायल्‍स, मॉनिटरिंग, प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग, मुआवजा निर्णय जैसे पक्ष अब अधिक सक्रिय होंगे—यदि इनमें उपयुक्त संसाधन न हों, तो निर्णय प्रक्रिया में त्रुटियाँ संभव हैं।

उद्योग को यह समझना होगा कि “तेजी” के साथ “सुरक्षा एवं प्रभावशीलता” की बराबरी जरूरी है; सिर्फ स्वीकृति की गति बढ़ना लक्ष्य नहीं होना चाहिए बल्कि गुणवत्ता-नियंत्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

कहाँ से आया यह बदलाव — वैश्विक संदर्भ और भारत का स्थान

विश्व स्तर पर देखा जाए तो European Medicines Agency (EMA), U.S. Food and Drug Administration (US FDA) जैसे नियामक पहले से ही तेजी और विज्ञान-आधारित समीक्षा-प्रक्रियाएँ अपनाए हुए हैं।

भारत में Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) अंतर्गत ऐसा बदलाव 2019 में “New Drugs and Clinical Trials Rules” के रूप में आया था एवं डिजिटल रूप से “Digital Drugs Regulatory System (DDRS)” जैसी पहलें भी चल रही हैं।

इस नवीन अधिकार वितरण से भारत का दवा-अनुमोदन ढाँचा वैश्विक मानकों के करीब आने की ओर अग्रसर होगा, जिससे “भारत में नया चिकित्सा नवाचार” (medical innovation in India) और “वैश्विक दवा निर्माण” (global pharma manufacturing) के संदर्भ में अवसर बढ़ सकते हैं।

विशेष केंद्रित लाभ — डायबिटीज और मोटापे (diabetes treatment & obesity drug) की चुनौतियाँ

भारत में डायबिटीज (diabetes) और मोटापे (obesity) की समस्या बहुत तीव्र है। अनेक शोध बताते हैं कि मोटापे से ग्रस्त व्यक्ति में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ जाता है, तथा मोटापे को कम करना डायबिटीज नियंत्रण को बेहतर बनाने में सहायक होता है।

नए weight loss injections एवं obesity drugs, जिनमें “liraglutide benefits” जैसी टैगलाइन भी सुनाई देती हैं, वैश्विक रूप से तेजी से स्वीकार हो रही हैं। भारत में इन उपचारों के लिए अनुमति-प्रक्रिया और साइट-स्वीकृति धीमी पड़ने वाली चुनौतियाँ रही हैं।

इस संदर्भ में सह-नियंत्रकों को अधिकार देना यह संकेत है कि भारत में इन प्रकार की दवाओं की मंजूरी और साइट्स के अनुमोदन की गति बढ़ सकती है, जिससे डायबिटीज-मोटापा उपचार की दृष्टि से मरीजों को अधिक विकल्प मिल सकते हैं।

हालाँकि यह स्पष्ट है कि इस प्रकार की दवाओं के लिए “सुरक्षा-प्रोफाइल”, “साइड-इफेक्ट्स”, “दूर्घटनाओं की रिपोर्टिंग” और “लंबी अवधि के प्रभाव” की समीक्षा और अधिक महत्वपूर्ण होती है — इसलिए नियामक गति बढ़ते हुए भी सावधानी नहीं छोड़ सकते।

निष्कर्ष

इस तरह, Central Drugs Standard Control Organisation द्वारा सह-ड्रग नियंत्रकों को अधिकार देने का यह कदम सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि भारत के फार्मा-उद्योग, नवोन्मेष और स्वास्थ्य-उपचार परिदृश्य में महत्वपूर्ण मोड़ का प्रतीक है।

भविष्य में इससे यह उम्मीद की जा सकती है कि दवा-स्वीकृति की प्रक्रिया में बेहतर गति आएगी, नए क्लीनिकल ट्रायल साइट्स जल्दी खुलेंगे, और भारत में डायबिटीज और मोटापे जैसी आधुनिक चुनौतियों के लिए नए उपचार-विकल्प समयोचित रूप से उपलब्ध हो सकेंगे।

हालाँकि, यह तभी सकारात्मक रूप से फलित होगा जब नियामक प्रक्रिया में गुणवत्ता, सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे। उद्योग-नियामक साझेदारी, प्रशिक्षण-संसाधन और ट्रायल-मॉनिटरिंग का स्तर उन्नत होना अनिवार्य है।

भारत-उद्यमिता (Make in India) और वैश्विक दवा निर्माण (global pharma manufacturing) के दृष्टिकोण से यह कदम एक स्वागत योग्य संकेत है। रोगियों को, विशेषकर वह जो उपचार-विकल्पों का इंतजार कर रहे हैं, यह उम्मीद दी जा सकती है कि आने वाले समय में उनकी पहुँच में सुधार होगा।

स्वास्थ्य पेशेवरों को और उद्योग को भी सुझाव है कि वे इस परिवर्तन को सक्रिय रूप से देखें, नियामक प्रक्रिया में सहयोग करें, ट्रायल्स और नए साइट्स के लिए पूर्व-तैयारी करें तथा गुणवत्ता-सक्षम नवाचार लाएँ।

संदर्भ
  • CDSCO powers up Joint Drug Controllers to drive faster approvals”, ET Pharma, 1 नवंबर 2025.

  • CDSCO – About Us / Functions, Central Drugs Standard Control Organisation।

  • Comparing FDA, EMA and CDSCO regulatory frameworks, Company Connects, 2 मई 2025।

  • Digital Drugs Regulatory System (DDRS) – CDSCO, Expression of Interest, नवम्बर 2023।

Disclaimer

यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।

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