भारत अब सेल और जीन थेरेपी को दवा लाइसेंस नियमों के तहत करेगा नियंत्रित— स्वास्थ्य मंत्रालय ने जारी किया नया ड्राफ्ट नियम

भारत सरकार ने सेल और जीन थेरेपी को दवा लाइसेंस नियमों के तहत लाने का प्रस्ताव जारी किया है, जिससे इन अत्याधुनिक उपचारों की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

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ASHISH PRADHAN

10/27/20251 min read

भारत में सेल और जीन थेरेपी को दवा कानून के तहत नियंत्रित करने का नया प्रस्ताव
भारत में सेल और जीन थेरेपी को दवा कानून के तहत नियंत्रित करने का नया प्रस्ताव

भारत सरकार ने हाल ही में एक ऐसा प्रस्ताव जारी किया है जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अब देश में अत्याधुनिक चिकित्सा-उपचारों जैसे कि सेल थेरेपी (Cell Therapy) और जीन थेरेपी (Gene Therapy) को पारंपरिक दवाओं (drugs) की तरह नियंत्रित किया जाएगा और उन्हें ड्रग लाइसेंस नियमों (Drug Licensing Rules) के दायरे में लाया जाएगा।

इस प्रस्ताव को Ministry of Health and Family Welfare (MoHFW) द्वारा ड्राफ्ट के रूप में जारी किया गया है, और इसके अंतर्गत 16 अक्टूबर 2025 को गज़ट नोटिफिकेशन (G.S.R. 758(E)) प्रकाशित हुआ है। यह बदलाव मुख्य रूप से भारत में ऐसे उपचारों की गुणवत्ता, सुरक्षा और नैदानिक परीक्षण-प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से किया गया है, ताकि मरीजों को भरोसेमंद तथा वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणित विकल्प मिल सकें।

इस लेख में हम इस नियामक प्रस्ताव के पीछे का कारण, वर्तमान परिदृश्य, इस बदलाव के क्या-क्या अर्थ हैं, किस तरह उद्योग तथा रोगी प्रभावित होंगे, और आगे क्या-क्या चुनौतियाँ खड़ी होंगी—इन सब की विस्तृत चर्चा करेंगे।

वर्तमान परिदृश्य और पृष्ठभूमि

भारत में चिकित्सा विज्ञान के विकास के साथ-साथ उन रोगों की संख्या में भी वृद्धि हुई है जिनमें पारंपरिक उपचार विकल्प सीमित साबित होते हैं, उदाहरणस्वरूप डायबिटीज़ (diabetes) और मोटापा (obesity) जैसी असाध्य समस्याएँ। विश्व स्तर पर करीब 4 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज़ से प्रभावित हैं और मोटापे की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में शोधकर्ता नए उपचार-मोड खोजने में लगे हैं, जिनमें सेल और जीन थेरेपी जैसी उच्चप्रौद्योगिकी आधारित तकनीकें शामिल हैं।


भारत में हालांकि इन उपचारों के अनुप्रयोग अभी सीमित हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्टेम-सेल रिसर्च, जीन परीक्षा, कार-टी (CAR-T) सेल थेरेपी आदि पर काम तेजी से बढ़ा है। उदाहरणस्वरूप, भारत में जीन थेरेपी तथा स्टेम-सेल आधारित उत्पादों को “नई दवा” (new drug) के रूप में देखा गया है और परीक्षण-प्रक्रियाएँ चल रही हैं।

उल्‍लेखनीय है कि भारत में अब तक इस क्षेत्र में नियामक अस्पष्टता पाई जाती थी — कई क्लीनिक “स्टेम-सेल उपचार” नाम से बिना पर्याप्त परीक्षण के सेवाएँ प्रदान कर रहे थे, जिससे रोगियों को जोखिम का सामना करना पड़ा है। ऐसे में सरकार ने दृढ़ संकेत दिया है कि आगे कोई भी सेल-या जीन आधारित उपचार बिना लाइसेंस और नियामक प्रक्रिया के नहीं चलेगा।

इस प्रस्ताव का क्या मतलब है?

संक्षिप्त रूप से कहा जाए तो, इस ड्राफ्ट संशोधन के माध्यम से भारत की दवाओं एवं चिकित्सा उपचारों को नियंत्रित करने वाली कानूनी रूपरेखा में सेल या स्टेम सेल द्वारा प्राप्त उत्पाद, जीन थेरेप्युटिक उत्पाद अथवा जेन्‍नोग्राफ्ट्स (xenografts) आदि को “रिकोम्बिनेंट डीएनए (r-DNA) द्वारा प्राप्त दवाओं” के समान श्रेणी में लाया जा रहा है।

इसके अंतर्गत निम्नलिखित महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित हैं:

  • ड्रग्स रूल्स, 1945 की धारा 75, 75A, 76, 76A तथा फार्म्स 27D, 27DA, 28D, 28DA में संशोधन: जहाँ “Recombinant DNA derived drugs” लिखा है, वहाँ अब “Cell or Stem Cell derived products, Gene therapeutic products or Xenografts, etc.” शब्द जोड़ने का प्रस्ताव है।

  • इन नए तकनीकी-उपचारों को निर्माण और आयात लाइसेंस, GMP (Good Manufacturing Practice) अनुपालन और केंद्रीय नियामक – Central Drugs Standard Control Organisation/Drugs Controller General of India (DCGI) की अनुमति के अंतर्गत लाया जाना प्रस्तावित है।

  • सार्वजनिक सुझाव-प्रक्रिया (public consultation) प्रारंभ की गई है जिसमें 30 दिन के भीतर सुझाव/आपत्तियाँ मांगी गई हैं।

इस तरह यह एक ऐसा नियामक ढाँचा तैयार कर रहा है जो इन जटिल तकनीकों को वैज्ञानिक, नैतिक एवं सुरक्षित तरीके से उपयोग में लाना सुनिश्चित करेगा।

इस बदलाव से उद्योग, चिकित्सा-संस्था और रोगी कैसे प्रभावित होंगे?

उद्योग व रिसर्च का दृष्टिकोण

सेल एवं जीन थेरेपी विकसित कर रही बायोटेक कंपनी, अनुसंधान-संस्था और अस्पताल अब स्पष्ट नियामक दिशा-निर्देशों से लाभान्वित होंगे। नियमों की स्पष्टता निवेश आकर्षित करेगी, उत्पादन-प्रक्रियाएँ पारदर्शी होंगी और वैश्विक मानकों के अनुरूप कार्य करना संभव होगा। उदाहरणस्वरूप, इस क्षेत्र में स्थानीय निर्माण (local manufacturing) तथा तकनीकी क्षमता (technical capability) के विकास की दिशा में प्रोत्साहन मिल सकता है।

अस्पताल, क्लीनिक तथा चिकित्सक

चिकित्सक अब उन उपचार विकल्पों को अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनाने के योग्य होंगे जिनके पीछे कानूनी एवं वैज्ञानिक समर्थन उपलब्ध होगा। साथ ही अनमान्य या परीक्षणहीन थेरेपियों से बचाव होगा, जिससे मरीजों की सुरक्षा बेहतर होगी।

रोगियों के लिए लाभ

रोगियों को यह फायदा होगा कि अब सेल-या जीन थेरेपी लेने से पूर्व परीक्षण व लाइसेंस-प्रक्रिया सुनिश्चित होगी। इससे जोखिम कम होगा, इलाज की गुणवत्ता बेहतर होगी, और भरोसा बढ़ेगा कि जो विकल्प मिल रहा है वह केवल “उम्मीद” पर आधारित नहीं बल्कि नियामक एवं वैज्ञानिक रूप से समर्थित होगा।

किन चुनौतियों का सामना करना होगा?

हालाँकि यह सुधार स्वागत योग्य है, लेकिन इसे सफलतापूर्वक लागू करने के लिए कई चुनौतियाँ हैं:

  • उच्च लागत: सेल और जीन थेरेपी सामान्य दवाओं की तुलना में बहुत महंगी होती हैं। लाइसेंस-मेनुअल, GMP सुविधा, विशेष अनुसंधान-प्रयोगशालाएँ आदि लागत बढ़ाएंगी।

  • मैनपावर व विशेषज्ञता: इन तकनीकों के विकास, विनियमन व समीक्षा के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित वैज्ञानिक, क्लीनिकल ट्रायल विशेषज्ञ, GMP इंजीनियर आदि की आवश्यकता है।

  • संक्रमण-प्रबंधन और कड़ाई: इन थेरेपीज़ में लंबी-कालीन निगरानी (long-term follow-up) अनिवार्य हो सकती है, जिससे समय, संसाधन और डेटा संग्रह का बोझ होगा।

  • प्रवेश और समावेशन (Access & Equity): यदि इन थेरेपीज़ महंगी रह गईं, तो जिनके पास संसाधन कम हैं, वे इससे वंचित हो सकते हैं—इससे सामाजिक असमानता बढ़ने का जोखिम है।

  • पूर्व-प्रायोगिक (pre-clinical) एवं नैदानिक ट्रायल डेटा की उपलब्धता: इन उपचारों में जोखिम-लाभ का संतुलन महत्त्वपूर्ण है, अतः पर्याप्त डेटा और परीक्षण परिणामों की आवश्यकता होगी।

आगे का रास्ता और क्या अपेक्षित है?

इस प्रस्तावित बदलाव के बाद अगले कुछ वर्षों में निम्नलिखित दिशा-निर्देश तथा कदम प्रमुख होंगे:

  • नियामक अधिकारी (CDSCO/DCGI) द्वारा दिशानिर्देश (guidance documents) जारी करना कि कैसे सेल-या जीन थेरेपी का निर्माण, परीक्षण व बिक्री हो सकती है।

  • उद्योग-वैश्विक सहयोग: भारत में स्थानीय निर्माण को बढ़ावा देने के लिए विदेशी-निर्माताओं तथा शोध-संस्थाओं के साथ साझेदारी संभव है।

  • रोग-विशिष्ट थेरेपीज़, जैसे कि आनुवंशिक विकार, कैंसर, न्यूरो-डिजेनरेटिव रोग आदि में सेल-जीन थेरेपी के अनुप्रयोगों का विस्तार।

  • सार्वजनिक जागरूकता: मरीजों, चिकित्सकों तथा शोधकर्ताओं को यह समझना होगा कि ये थेरेपी विकल्प नहीं चमत्कार हैं—इनका उपयोग वैज्ञानिक परीक्षण, निगरानी और नियामक प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए।

  • लागत-नियंत्रण एवं नीति-समर्थन: सरकार, बीमा-कंपनियाँ और निजी क्षेत्र मिलकर यह तय करेंगे कि इन महंगी थेरेपीज़ का लाभ अधिकाधिक लोगों तक पहुँच सके।

निष्कर्ष

संक्षिप्त में कहा जाए तो, भारत द्वारा इस प्रकार का नियामक बदलाव यह संकेत देता है कि देश उन्नत चिकित्सा-तकनीकों को मात्र शोध-प्रयोगशाला की सीमाओं से बाहर निकालकर वास्तविक-उपचार के विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। यह कदम मरीज-सुरक्षा, वैज्ञानिक विश्वसनीयता एवं उद्योग-विकास—तीनों को कदम-दर-कदम आगे ले जाने की दिशा में है। हालांकि चुनौतियाँ बड़ी हैं, लेकिन यदि इन पर सफलतापूर्वक अमल हुआ, तो भारत में सेल और जीन थेरेपी के क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत हो सकती है—जिसका प्रत्यक्ष लाभ रोगियों को मिलेगा, और जो वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को भी बल देगी।

Disclaimer

यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।

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