गुदा रोग क्या वाकई इतने खतरनाक हैं? बवासीर–फिशर–फिस्टुला के लक्षण जिन्हें नज़रअंदाज़ करना भारी पड़ सकता है।
गुदा रोगों के बढ़ते मामलों में बवासीर, फिशर और फिस्टुला सबसे आम हैं—लेकिन ज्यादातर लोग लक्षणों को शर्म के कारण छिपाते रहते हैं। इस लेख में जानें शुरुआती संकेत, मुख्य कारण, आधुनिक इलाज और वे आदतें जो आपकी हालत बिगाड़ भी सकती हैं और बचा भी सकती हैं।
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गुदा रोग (Anal Diseases): लक्षण, कारण और उपचार की संपूर्ण जानकारी
गुदा से संबंधित बीमारियां आज के समय में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही हैं, लेकिन सामाजिक संकोच और जागरूकता की कमी के कारण अधिकांश लोग इसे नजरअंदाज करते हैं और समय रहते इलाज नहीं करवाते, जिसके परिणामस्वरूप स्थिति गंभीर हो जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग 50 प्रतिशत वयस्क अपने जीवनकाल में किसी न किसी प्रकार के गुदा रोग से प्रभावित होते हैं, जबकि भारत में यह समस्या खानपान की बदलती आदतों, गतिहीन जीवनशैली और पर्याप्त फाइबर की कमी के कारण तेजी से बढ़ रही है।
इस लेख में हम गुदा रोगों के विभिन्न प्रकारों, उनके लक्षणों, कारणों और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा उपलब्ध उपचार विकल्पों की विस्तृत जानकारी प्रदान करेंगे, ताकि पाठक इस संवेदनशील विषय को बेहतर ढंग से समझ सकें और समय पर उचित चिकित्सीय सहायता प्राप्त कर सकें।
गुदा रोग क्या हैं और क्यों होते हैं?
गुदा रोग (Anal Diseases) वे स्वास्थ्य समस्याएं हैं जो गुदा क्षेत्र, मलाशय या उसके आसपास के ऊतकों को प्रभावित करती हैं और इनमें बवासीर (हेमोरॉइड्स), फिशर, फिस्टुला, एब्सेस और अन्य संक्रमण शामिल हैं।
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) के कोलोरेक्टल सर्जरी विभाग के अनुसार, भारत में लगभग 40 से 50 प्रतिशत वयस्क जनसंख्या किसी न किसी रूप में बवासीर से पीड़ित है, जो इस समस्या की व्यापकता को दर्शाता है।
इन रोगों के मुख्य कारणों में लंबे समय तक कब्ज रहना, मल त्याग के दौरान अत्यधिक जोर लगाना, गर्भावस्था के दौरान पेल्विक क्षेत्र पर दबाव बढ़ना, मोटापा, देर तक एक ही स्थिति में बैठे रहने की आदत, आहार में फाइबर की कमी और पर्याप्त मात्रा में पानी न पीना प्रमुख हैं।
डॉ. राजेश शर्मा, जो दिल्ली के एक प्रमुख अस्पताल में वरिष्ठ कोलोरेक्टल सर्जन हैं, बताते हैं, "आधुनिक जीवनशैली में लोग घंटों डेस्क पर बैठे रहते हैं, प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन करते हैं और व्यायाम की उपेक्षा करते हैं, जिससे पाचन तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और गुदा रोगों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।"
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इसके अलावा, आनुवंशिक कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि यदि परिवार में किसी को यह समस्या रही हो तो अगली पीढ़ी में भी इसके होने की संभावना अधिक होती है।
बवासीर:
सबसे आम गुदा रोग और इसके लक्षण बवासीर, जिसे चिकित्सीय भाषा में हेमोरॉइड्स कहा जाता है, गुदा और मलाशय के निचले हिस्से में स्थित रक्त वाहिकाओं में सूजन की स्थिति है, जो आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार की हो सकती है। आंतरिक बवासीर मलाशय के अंदर विकसित होती है और सामान्यतः दर्द रहित होती है, लेकिन मल त्याग के दौरान रक्तस्राव हो सकता है, जबकि बाह्य बवासीर गुदा के बाहरी हिस्से में होती है और इसमें खुजली, जलन, सूजन और तीव्र दर्द की समस्या होती है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एंड डाइजेस्टिव एंड किडनी डिजीजेज (एनआईडीडीके) के शोध के अनुसार, 45 से 65 वर्ष की आयु के लोगों में बवासीर की घटनाएं सबसे अधिक पाई जाती हैं, हालांकि यह समस्या युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है।
बवासीर के प्रमुख लक्षणों में मल के साथ चमकीले लाल रंग का रक्त आना, गुदा क्षेत्र में लगातार खुजली या जलन महसूस होना, मल त्याग के दौरान या बाद में दर्द होना, गुदा के पास सूजन या गांठ महसूस होना और बैठने में असुविधा होना शामिल है।
मुंबई के जसलोक अस्पताल में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. प्रिया मेहता कहती हैं, "मरीज अक्सर शर्मिंदगी के कारण इन लक्षणों को छिपाते हैं और घरेलू उपचारों पर निर्भर रहते हैं, जो कई बार स्थिति को और खराब कर देता है, इसलिए जरूरी है कि किसी भी असामान्य लक्षण दिखने पर तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लें।"
बवासीर की गंभीरता को चार ग्रेड में वर्गीकृत किया जाता है - पहली ग्रेड में केवल आंतरिक सूजन होती है, दूसरी ग्रेड में मल त्याग के दौरान बवासीर बाहर आती है लेकिन अपने आप वापस चली जाती है, तीसरी ग्रेड में इसे हाथ से अंदर धकेलना पड़ता है और चौथी ग्रेड में यह लगातार बाहर रहती है और अत्यधिक दर्दनाक होती है।
एनल फिशर:
दर्दनाक घाव और इसकी पहचान एनल फिशर गुदा की त्वचा में एक छोटा सा कट या घाव है जो अत्यधिक दर्दनाक होता है और मुख्य रूप से कठोर मल के गुजरने या लंबे समय तक दस्त की समस्या के कारण होता है। यह समस्या किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन शिशुओं और युवा वयस्कों में यह अधिक आम है।
अमेरिकन सोसाइटी ऑफ कोलोन एंड रेक्टल सर्जन्स के अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत एनल फिशर तीव्र होते हैं और उचित उपचार से छह सप्ताह के भीतर ठीक हो जाते हैं, जबकि 20 प्रतिशत मामले क्रोनिक हो जाते हैं और इनमें सर्जिकल हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ सकती है।
फिशर के मुख्य लक्षणों में मल त्याग के दौरान तीव्र, चाकू जैसा दर्द होना जो कई घंटों तक बना रह सकता है, मल या टॉयलेट पेपर पर चमकीला लाल रक्त दिखना, गुदा में दरार दिखाई देना और गुदा के आसपास की त्वचा में छोटी गांठ या स्किन टैग बनना शामिल है।
बेंगलुरु के मणिपाल अस्पताल में कोलोरेक्टल सर्जन डॉ. संजय कुमार बताते हैं, "फिशर के मरीज अक्सर मल त्याग से डरने लगते हैं क्योंकि इसमें असहनीय दर्द होता है, जिससे वे मल को रोके रखते हैं और यह स्थिति को और गंभीर बना देता है, इसलिए तुरंत इलाज शुरू करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।" फिशर के कारणों में क्रोनिक कब्ज, क्रोहन रोग, अल्सरेटिव कोलाइटिस, एचआईवी संक्रमण, तपेदिक और कुछ प्रकार के कैंसर भी शामिल हो सकते हैं।
एनल फिस्टुला और एब्सेस:
जटिल स्थितियां एनल फिस्टुला एक असामान्य सुरंग या मार्ग है जो गुदा की आंतरिक परत से त्वचा की सतह तक बनता है और यह आमतौर पर एनल एब्सेस (मवाद से भरी गांठ) के ठीक होने के बाद विकसित होता है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 50 प्रतिशत एनल एब्सेस के मामले फिस्टुला में परिवर्तित हो जाते हैं यदि समय पर उचित उपचार न किया जाए। एब्सेस तब बनता है जब गुदा के पास स्थित छोटी ग्रंथियां बैक्टीरिया से संक्रमित हो जाती हैं और उनमें मवाद जमा होने लगता है, जिससे तीव्र दर्द, सूजन और कभी-कभी बुखार भी हो सकता है।
फिस्टुला के लक्षणों में गुदा के पास एक छेद से लगातार या बार-बार रिसाव होना, जिसमें मवाद, रक्त या बदबूदार द्रव निकलता है, गुदा के आसपास की त्वचा में लालिमा और सूजन, बार-बार एब्सेस बनना, मल त्याग के दौरान दर्द होना और कभी-कभी बुखार और थकान महसूस होना शामिल है।
चेन्नई के अपोलो अस्पताल में वरिष्ठ सर्जन डॉ. रमेश बालाकृष्णन कहते हैं, "फिस्टुला का उपचार जटिल हो सकता है क्योंकि यह गुदा की मांसपेशियों के माध्यम से गुजर सकता है और सर्जरी के दौरान इन मांसपेशियों को नुकसान पहुंचने से मल नियंत्रण की समस्या हो सकती है, इसलिए अनुभवी सर्जन का चयन बेहद महत्वपूर्ण है।" फिस्टुला को उसकी जटिलता के आधार पर सिंपल और कॉम्प्लेक्स श्रेणियों में बांटा जाता है, जो उपचार के तरीके को निर्धारित करता है।
गुदा रोगों का निदान:
आधुनिक तकनीकें गुदा रोगों का सटीक निदान उचित उपचार योजना बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है और इसमें विभिन्न परीक्षणों का उपयोग किया जाता है। प्रारंभिक जांच में चिकित्सक रोगी का विस्तृत चिकित्सा इतिहास लेते हैं और शारीरिक परीक्षण करते हैं, जिसमें गुदा क्षेत्र की दृश्य जांच और डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन (DRE) शामिल है, जहां चिकित्सक दस्ताने पहनकर और लुब्रिकेंट लगाकर अपनी उंगली से गुदा और निचले मलाशय की जांच करते हैं। एनोस्कोपी एक छोटी प्रक्रिया है जिसमें एक विशेष उपकरण का उपयोग करके गुदा की आंतरिक परत को देखा जाता है, जबकि प्रोक्टोस्कोपी में मलाशय के बड़े हिस्से की जांच की जाती है।
अधिक जटिल मामलों में सिग्मोइडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी की आवश्यकता हो सकती है, जो पूरे बड़ी आंत की विस्तृत जांच करने में मदद करती है और किसी भी असामान्यता, सूजन या ट्यूमर का पता लगाने में सहायक होती है।
डॉ. अनिता देशमुख, जो पुणे के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट हैं, बताती हैं, "एंडोएनल अल्ट्रासाउंड और एमआरआई जैसी उन्नत इमेजिंग तकनीकें फिस्टुला जैसी जटिल समस्याओं में सुरंग के पूरे मार्ग को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जो सर्जिकल योजना बनाने में अत्यंत उपयोगी है।" इसके अलावा, बायोप्सी भी की जा सकती है यदि कैंसर या अन्य गंभीर स्थितियों का संदेह हो, जिसमें ऊतक का एक छोटा नमूना लेकर प्रयोगशाला में विश्लेषण किया जाता है।
रूढ़िवादी उपचार:
दवाएं और जीवनशैली में बदलाव गुदा रोगों के प्रारंभिक और हल्के मामलों में अक्सर रूढ़िवादी उपचार प्रभावी होते हैं, जिनमें जीवनशैली में संशोधन और दवाओं का उपयोग शामिल है। कब्ज को नियंत्रित करने के लिए फाइबर सप्लीमेंट्स जैसे साइलियम हस्क (इसबगोल) या मिथाइलसेलुलोज का सेवन बढ़ाया जाता है, जो मल को नरम बनाते हैं और मल त्याग को आसान बनाते हैं।
स्टूल सॉफ्टनर्स जैसे डॉक्यूसेट सोडियम भी निर्धारित किए जा सकते हैं, जो मल में पानी की मात्रा बढ़ाते हैं और कठोरता को कम करते हैं। दर्द और सूजन को कम करने के लिए स्थानीय एनेस्थेटिक्स और कॉर्टिकोस्टेरॉइड युक्त क्रीम या मलहम का उपयोग किया जाता है, जो अस्थायी राहत प्रदान करते हैं।
हैदराबाद के केयर हॉस्पिटल में प्रोक्टोलॉजिस्ट डॉ. विजय कुमार रेड्डी कहते हैं, "सिट्ज बाथ, जिसमें गुदा क्षेत्र को गर्म पानी में 10 से 15 मिनट तक भिगोया जाता है, विशेष रूप से मल त्याग के बाद, दर्द और खुजली को कम करने में अत्यधिक प्रभावी है और उपचार प्रक्रिया को तेज करता है।" फिशर के मामलों में नाइट्रोग्लिसरीन या कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स युक्त मलहम का उपयोग किया जाता है, जो गुदा की मांसपेशियों को आराम देते हैं और रक्त प्रवाह बढ़ाकर उपचार में सहायता करते हैं।
जीवनशैली में बदलाव में पर्याप्त पानी पीना (दिन में कम से कम 8 से 10 गिलास), फाइबर युक्त आहार जैसे फल, सब्जियां, साबुत अनाज और दालें खाना, नियमित व्यायाम करना, लंबे समय तक बैठे रहने से बचना और मल की इच्छा को कभी न रोकना शामिल है।
न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रियाएं:
आधुनिक विकल्प जब रूढ़िवादी उपचार प्रभावी नहीं होते या रोग की गंभीरता अधिक होती है, तब न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रियाओं का विकल्प चुना जाता है, जो पारंपरिक सर्जरी की तुलना में कम दर्दनाक और तेजी से रिकवरी प्रदान करती हैं।
रबर बैंड लिगेशन आंतरिक बवासीर के उपचार की एक लोकप्रिय तकनीक है, जिसमें बवासीर के आधार पर एक छोटा रबर बैंड लगाया जाता है जो रक्त आपूर्ति को रोक देता है और कुछ दिनों में बवासीर सूख कर गिर जाती है। स्क्लेरोथेरेपी में एक रासायनिक घोल को बवासीर में इंजेक्ट किया जाता है, जो रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ देता है और बवासीर को छोटा कर देता है।
इंफ्रारेड कोएगुलेशन (IRC) में इंफ्रारेड प्रकाश का उपयोग करके बवासीर के ऊतकों को जलाया जाता है, जिससे वे सिकुड़ जाते हैं। लेजर थेरेपी एक उन्नत तकनीक है जिसमें लेजर बीम का उपयोग करके बवासीर के ऊतकों को सटीकता से हटाया जाता है, जिससे रक्तस्राव न्यूनतम होता है और रिकवरी तेज होती है।
कोलकाता के फोर्टिस अस्पताल में लेजर प्रोक्टोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. सौरभ घोष बताते हैं, "लेजर हेमोरॉइडोप्लास्टी एक दिवसीय प्रक्रिया है जिसमें मरीज उसी दिन घर जा सकता है और सामान्य गतिविधियां 2 से 3 दिनों में शुरू कर सकता है, जो पारंपरिक सर्जरी की तुलना में बहुत बड़ा फायदा है।" स्टेपलर सर्जरी या स्टेपल्ड हेमोरॉइडोपेक्सी एक और विकल्प है जिसमें विशेष स्टेपलिंग उपकरण का उपयोग करके बवासीर को उसकी सामान्य स्थिति में वापस ले जाया जाता है और रक्त आपूर्ति को काट दिया जाता है।
सर्जिकल उपचार:
जब अन्य विकल्प विफल हो जाएं गंभीर और जटिल मामलों में, विशेष रूप से चौथी ग्रेड की बवासीर, क्रोनिक फिशर और कॉम्प्लेक्स फिस्टुला में, सर्जिकल हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। हेमोरॉइडेक्टोमी पारंपरिक सर्जिकल प्रक्रिया है जिसमें बवासीर के ऊतकों को पूरी तरह से हटा दिया जाता है, जो सबसे प्रभावी उपचार माना जाता है लेकिन इसमें रिकवरी का समय अधिक होता है और पोस्ट-ऑपरेटिव दर्द भी ज्यादा हो सकता है। लेटरल इंटरनल स्फिंक्टरोटॉमी क्रोनिक फिशर के लिए मानक सर्जिकल उपचार है, जिसमें गुदा की आंतरिक स्फिंक्टर मांसपेशी के एक छोटे हिस्से को काटा जाता है ताकि मांसपेशियों में ऐंठन कम हो और रक्त प्रवाह बढ़े, जिससे फिशर ठीक हो सके।
फिस्टुला सर्जरी की विभिन्न तकनीकें हैं जो फिस्टुला के प्रकार और स्थान पर निर्भर करती हैं। फिस्टुलोटॉमी में फिस्टुला के मार्ग को खोल दिया जाता है और इसे ठीक होने के लिए छोड़ दिया जाता है, जबकि फिस्टुलेक्टोमी में पूरे फिस्टुला ट्रैक्ट को हटा दिया जाता है। एडवांस फ्लैप तकनीक में स्वस्थ ऊतक का एक फ्लैप बनाकर फिस्टुला के आंतरिक छिद्र को बंद किया जाता है।
लिफ्ट प्रक्रिया (लिगेशन ऑफ इंटरस्फिंक्टेरिक फिस्टुला ट्रैक्ट) एक नई तकनीक है जो स्फिंक्टर मांसपेशियों को बचाते हुए फिस्टुला को बंद करती है। नागपुर के ऑरेंज सिटी अस्पताल में कोलोरेक्टल सर्जन डॉ. अमित पाटिल कहते हैं, "वीडियो-असिस्टेड एनल फिस्टुला ट्रीटमेंट (वीएएएफटी) जैसी आधुनिक तकनीकें फिस्टुला के उपचार में क्रांतिकारी साबित हो रही हैं, जिनमें स्फिंक्टर डैमेज का खतरा न्यूनतम होता है और सफलता दर 80 प्रतिशत से अधिक है।"
उपचार के बाद देखभाल और पुनर्वास
सर्जरी या किसी भी प्रक्रिया के बाद उचित देखभाल और पुनर्वास सफल परिणाम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पोस्ट-ऑपरेटिव अवधि में दर्द प्रबंधन के लिए चिकित्सक द्वारा निर्धारित दर्द निवारक दवाएं समय पर लेनी चाहिए और स्टूल सॉफ्टनर्स का नियमित उपयोग करना चाहिए ताकि मल त्याग में कठिनाई न हो।
घाव की देखभाल में प्रतिदिन सिट्ज बाथ लेना, गुदा क्षेत्र को साफ और सूखा रखना और चिकित्सक द्वारा निर्धारित मलहम या क्रीम का उपयोग करना शामिल है। आहार में धीरे-धीरे ठोस भोजन शुरू करना चाहिए, लेकिन फाइबर युक्त और पचने मेंआसान खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
शारीरिक गतिविधियों को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए, लेकिन पहले कुछ हफ्तों में भारी वजन उठाने, तीव्र व्यायाम और लंबे समय तक खड़े रहने से बचना चाहिए। चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) में फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. नेहा वर्मा बताती हैं, "पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज, जिन्हें कीगल एक्सरसाइज भी कहा जाता है, गुदा की मांसपेशियों को मजबूत करने और मल नियंत्रण में सुधार के लिए अत्यंत लाभकारी हैं, विशेष रूप से फिस्टुला सर्जरी के बाद।" नियमित फॉलो-अप विजिट बेहद जरूरी हैं ताकि चिकित्सक घाव के भरने की प्रगति को मॉनिटर कर सकें और किसी भी जटिलता का शीघ्र पता लगा सकें। संक्रमण के लक्षणों जैसे बढ़ती लालिमा, सूजन, बुखार या असामान्य डिस्चार्ज के मामले में तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
रोकथाम:
स्वस्थ आदतें और जागरूकता गुदा रोगों की रोकथाम में स्वस्थ जीवनशैली अपनाना और कुछ सरल लेकिन प्रभावी आदतों को अपने दैनिक जीवन में शामिल करना शामिल है। उच्च फाइबर युक्त आहार का सेवन सबसे महत्वपूर्ण है, जिसमें फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और सूखे मेवे शामिल हैं, जो प्रतिदिन 25 से 30 ग्राम फाइबर की सिफारिश को पूरा करने में मदद करते हैं। पर्याप्त पानी पीना (प्रतिदिन 8 से 10 गिलास) मल को नरम रखने और कब्ज से बचाव में सहायक होता है। नियमित शारीरिक गतिविधि जैसे टहलना, तैरना या योग करना पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है और मोटापे को नियंत्रित करने में मदद करता है।
मल त्याग की स्वस्थ आदतें अपनाना अत्यंत आवश्यक है - जब मल की इच्छा हो तो उसे कभी न रोकें, शौचालय में बैठने का समय 3 से 5 मिनट तक सीमित रखें और अत्यधिक जोर लगाने से बचें, शौचालय में बैठते समय पैरों के नीचे एक छोटा स्टूल रखें जिससे शारीरिक स्थिति बेहतर हो और मल त्याग आसान हो।
कोलकाता की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन की पोषण विशेषज्ञ डॉ. रीता दास कहती हैं, "भारतीय आहार में मसालेदार और तला हुआ भोजन अधिक होता है, जो पाचन तंत्र पर दबाव डालता है, इसलिए संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाना और प्रोसेस्ड फूड से बचना अत्यंत महत्वपूर्ण है।" धूम्रपान और अत्यधिक शराब के सेवन से बचना, तनाव को नियंत्रित करने के लिए ध्यान या योग का अभ्यास करना और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना भी गुदा रोगों की रोकथाम में सहायक है।
मनोवैज्ञानिक प्रभाव और सामाजिक कलंक
गुदा रोगों का केवल शारीरिक प्रभाव ही नहीं होता, बल्कि ये मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं। भारतीय समाज में इन समस्याओं के बारे में खुलकर बात करना एक वर्जना माना जाता है, जिससे मरीज शर्मिंदगी और डर के कारण समय पर चिकित्सा सहायता नहीं लेते।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहांस) के मनोचिकित्सक डॉ. आर. श्रीनिवासन बताते हैं, "गुदा रोगों से पीड़ित मरीजों में चिंता, अवसाद और सामाजिक अलगाव की समस्याएं आम हैं, विशेष रूप से जब लक्षण दीर्घकालिक हो जाते हैं और दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं।" निरंतर दर्द, खुजली और असुविधा के कारण नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है, काम की उत्पादकता घटती है और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी कम हो जाती है।
कई मरीज शर्म के कारण अपने परिवार के सदस्यों या करीबी दोस्तों को भी अपनी समस्या के बारे में नहीं बताते, जिससे वे मानसिक रूप से अकेला महसूस करते हैं। यौन स्वास्थ्य भी प्रभावित हो सकता है क्योंकि दर्द और असुविधा के कारण अंतरंगता में बाधा आती है।
मुंबई की टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की समाजशास्त्री डॉ. माया पिल्लई कहती हैं, "गुदा रोगों के प्रति सामाजिक कलंक को दूर करने के लिए व्यापक जागरूकता अभियानों की आवश्यकता है, जो लोगों को यह समझाएं कि ये सामान्य चिकित्सीय समस्याएं हैं जिनका प्रभावी उपचार उपलब्ध है और शर्मिंदगी के बजाय समय पर उपचार लेना समझदारी है।" सपोर्ट ग्रुप्स और काउंसलिंग सेवाएं मरीजों को भावनात्मक सहारा प्रदान करने और सामाजिक अलगाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
भारत में उपचार की उपलब्धता और चुनौतियां
भारत में गुदा रोगों के उपचार की सुविधाएं महानगरों और बड़े शहरों में तो अच्छी तरह से स्थापित हैं, लेकिन ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों और उन्नत उपचार विकल्पों की कमी एक बड़ी चुनौती है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के अनुसार, देश में प्रति लाख जनसंख्या पर केवल 0.5 से 1 कोलोरेक्टल सर्जन उपलब्ध हैं, जो विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है। सरकारी अस्पतालों में लंबी प्रतीक्षा सूचियां और सीमित संसाधन मरीजों के लिए समस्या बनते हैं, जबकि निजी अस्पतालों में उपचार की लागत बहुत अधिक हो सकती है, जो सामान्य आय वर्ग के लोगों के लिए वहनीय नहीं होती।
आयुष्मान भारत और अन्य सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में गुदा रोगों के उपचार को शामिल किया गया है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई पात्र लाभार्थी इन सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते।
दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. वी.के. बंसल कहते हैं, "हमें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सकों को गुदा रोगों की पहचान और प्रारंभिक प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि मरीजों को शुरुआती चरण में ही उचित सलाह और उपचार मिल सके।" टेलीमेडिसिन और डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म इस दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं, जो दूरदराज के मरीजों को विशेषज्ञों से परामर्श लेने का अवसर प्रदान करते हैं।
भविष्य की दिशाएं:
अनुसंधान और नवाचार गुदा रोगों के उपचार में निरंतर अनुसंधान और तकनीकी नवाचार हो रहे हैं जो भविष्य में और अधिक प्रभावी और कम इनवेसिव उपचार विकल्प प्रदान करेंगे।
स्टेम सेल थेरेपी फिस्टुला के उपचार में एक आशाजनक विकल्प के रूप में उभर रही है, जहां मरीज की अपनी वसा कोशिकाओं से स्टेम सेल्स निकालकर फिस्टुला के मार्ग में इंजेक्ट किए जाते हैं, जो ऊतकों के पुनर्जनन और उपचार को बढ़ावा देते हैं।
यूरोप और अमेरिका में किए गए प्रारंभिक क्लिनिकल ट्रायल्स में यह तकनीक काफी सफल रही है, जिसमें 60 से 70 प्रतिशत मामलों में फिस्टुला पूरी तरह बंद हो गया।
रोबोटिक सर्जरी एक और उन्नत तकनीक है जो जटिल गुदा रोगों के उपचार में उच्च सटीकता और बेहतर परिणाम प्रदान करती है। दा विंची सर्जिकल सिस्टम जैसे रोबोटिक प्लेटफॉर्म सर्जन को थ्री-डायमेंशनल विजन और अत्यधिक सटीक गतिविधियों की सुविधा देते हैं।
बैंगलोर के नारायण हेल्थ में रोबोटिक सर्जन डॉ. रघुनाथ रेड्डी बताते हैं, "रोबोटिक असिस्टेड सर्जरी में रक्त हानि बहुत कम होती है, रिकवरी का समय आधा हो जाता है और मरीज जल्दी अपनी सामान्य जीवनशैली में लौट सकते हैं।" बायोमार्कर्स और जेनेटिक टेस्टिंग के क्षेत्र में भी शोध चल रहा है जो भविष्य में व्यक्तिगत उपचार योजनाएं बनाने में मदद करेगा, जहां प्रत्येक मरीज की आनुवंशिक प्रोफाइल के आधार पर सबसे उपयुक्त उपचार चुना जा सकेगा।
निष्कर्ष:
जागरूकता और समय पर उपचार का महत्व
गुदा रोग एक आम लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या है जो किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है और यदि समय पर उचित उपचार न लिया जाए तो जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
सामाजिक कलंक और शर्मिंदगी के कारण लोग इन समस्याओं को छिपाते हैं और घरेलू उपचारों पर निर्भर रहते हैं, जो स्थिति को और खराब कर सकता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने इन रोगों के निदान और उपचार में उल्लेखनीय प्रगति की है, जिससे न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रियाओं से लेकर उन्नत सर्जिकल तकनीकों तक विभिन्न प्रभावी विकल्प उपलब्ध हैं।
डॉ. मनीष गुप्ता, जो जयपुर के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में वरिष्ठ प्रोक्टोलॉजिस्ट हैं, कहते हैं, "गुदा रोगों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और लोगों को यह समझाना कि ये शर्म का नहीं बल्कि उपचार का विषय है, हमारी सबसे बड़ी चुनौती है।"
रोकथाम हमेशा उपचार से बेहतर है और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर, फाइबर युक्त आहार लेकर, पर्याप्त पानी पीकर और नियमित व्यायाम करके गुदा रोगों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि कोई भी असामान्य लक्षण जैसे मल में रक्त, लगातार दर्द, खुजली या सूजन दिखाई दे तो तुरंत किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए, क्योंकि प्रारंभिक चरण में निदान और उपचार से न केवल जटिलताओं से बचा जा सकता है बल्कि तेजी से और बेहतर परिणाम भी प्राप्त होते हैं।
भारत सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाने, टेलीमेडिसिन को प्रोत्साहित करने और व्यापक जागरूकता कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है ताकि हर व्यक्ति को समय पर और गुणवत्तापूर्ण उपचार मिल सके।
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संदर्भ और स्रोत:
यह लेख विभिन्न प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों और विशेषज्ञों के विचारों पर आधारित है। जानकारी ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एंड डाइजेस्टिव एंड किडनी डिजीजेज (एनआईडीडीके), अमेरिकन सोसाइटी ऑफ कोलोन एंड रेक्टल सर्जन्स, विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के शोध और दिशानिर्देशों से संकलित की गई है। लेख में उद्धृत सभी विशेषज्ञ भारत के प्रमुख अस्पतालों में कार्यरत हैं और गुदा रोगों के उपचार में व्यापक अनुभव रखते हैं।
Disclaimer: यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है और किसी भी चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी उपचार को शुरू करने से पहले कृपया योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।



