शारीरिक निष्क्रियता से बढ़ता दिल का दौरा: नए शोध में चौंकाने वाले खुलासे
हालिया शोध में यह पाया गया है कि शारीरिक निष्क्रियता हृदय रोगों, विशेष रूप से दिल के दौरे के जोखिम को बढ़ा सकती है। अध्ययन के अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि की कमी से हृदय स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सक्रिय जीवनशैली अपनाने से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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प्रस्तावना
आधुनिक जीवनशैली की भागदौड़ में हम अक्सर अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस बात को पुख्ता सबूतों के साथ साबित किया है कि शारीरिक गतिविधियों की कमी सीधे तौर पर हृदय रोगों, विशेषकर दिल के दौरे के खतरे को कई गुना बढ़ा देती है। यह शोध विश्व के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों द्वारा किया गया है, जिसमें हजारों प्रतिभागियों के स्वास्थ्य डेटा का गहन विश्लेषण किया गया है और यह पाया गया है कि जो लोग नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम नहीं करते हैं या अत्यधिक गतिहीन जीवनशैली अपनाते हैं, उनमें हृदयाघात की संभावना सक्रिय जीवनशैली वाले लोगों की तुलना में 50 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ जाती है। इस अध्ययन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत सहित दुनिया के कई देशों में डेस्क जॉब, डिजिटल उपकरणों पर निर्भरता और शारीरिक श्रम में कमी के कारण निष्क्रियता एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है।
हृदय स्वास्थ्य पर शारीरिक निष्क्रियता का प्रभाव: वैज्ञानिक दृष्टिकोण
चिकित्सा विज्ञान में यह सर्वविदित तथ्य है कि नियमित शारीरिक गतिविधि हमारे हृदय की मांसपेशियों को मजबूत बनाती है, रक्त संचार को सुचारू रखती है और धमनियों में होने वाले ब्लॉकेज की संभावना को कम करती है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहता है, तो उसके शरीर में कई जैविक परिवर्तन होने लगते हैं जो हृदय स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक साबित होते हैं। सबसे पहले, गतिहीन जीवनशैली से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल का स्तर बढ़ने लगता है जबकि अच्छे कोलेस्ट्रॉल यानी एचडीएल का स्तर घटता जाता है, जिससे धमनियों की दीवारों पर वसा जमा होने लगती है और एथेरोस्क्लेरोसिस नामक स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
इसके अतिरिक्त, शारीरिक निष्क्रियता से शरीर का वजन बढ़ने लगता है, जो मोटापे को जन्म देता है और मोटापा अपने साथ उच्च रक्तचाप, मधुमेह और मेटाबोलिक सिंड्रोम जैसी समस्याएं लेकर आता है। ये सभी स्थितियां हृदय रोगों के प्रमुख जोखिम कारक माने जाते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि जब हम शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं रहते हैं, तो हमारे शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता घट जाती है, जिससे रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रण से बाहर हो जाता है और यह स्थिति सीधे तौर पर हृदय की रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुंचाती है।
शोध अध्ययन की विस्तृत जानकारी: कैसे किया गया यह महत्वपूर्ण अनुसंधान
यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा संचालित किया गया, जिसमें विभिन्न आयु वर्ग, लिंग और भौगोलिक पृष्ठभूमि के लगभग 25,000 से अधिक प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। इन प्रतिभागियों की शारीरिक गतिविधियों को वियरेबल फिटनेस ट्रैकर्स और नियमित स्वास्थ्य जांच के माध्यम से पांच से आठ वर्षों की अवधि में लगातार मॉनिटर किया गया, और उनके हृदय स्वास्थ्य के विभिन्न पैरामीटर्स जैसे रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल स्तर, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम और इकोकार्डियोग्राफी के माध्यम से दर्ज किए गए।
शोध के परिणाम बेहद चिंताजनक रहे क्योंकि जिन लोगों की दैनिक शारीरिक गतिविधि का स्तर न्यूनतम था यानी जो प्रतिदिन 30 मिनट से कम व्यायाम करते थे या सप्ताह में 150 मिनट से कम मध्यम तीव्रता की शारीरिक गतिविधियों में संलग्न रहते थे, उनमें कोरोनरी हृदय रोग विकसित होने की दर उन लोगों की तुलना में काफी अधिक पाई गई जो नियमित रूप से व्यायाम करते थे। विशेष रूप से 40 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों और रजोनिवृत्ति के बाद की महिलाओं में यह जोखिम और भी अधिक देखा गया, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ शारीरिक गतिविधि का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
क्या कहते हैं हृदय रोग विशेषज्ञ: मेडिकल एक्सपर्ट्स की राय
भारतीय हृदय चिकित्सा संस्थान और अन्य प्रतिष्ठित चिकित्सा केंद्रों के कार्डियोलॉजिस्ट इस शोध के निष्कर्षों से पूरी तरह सहमत हैं और वे लगातार अपने मरीजों को शारीरिक गतिविधियों को दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने की सलाह देते रहे हैं। दिल्ली के एक प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित कुमार शर्मा बताते हैं कि उनके पास आने वाले हृदयाघात के लगभग 70 प्रतिशत मरीजों में गतिहीन जीवनशैली एक प्रमुख जोखिम कारक के रूप में सामने आती है, और जब उन्होंने अपने मरीजों की दैनिक दिनचर्या का विश्लेषण किया तो पाया कि अधिकतर लोग दिन में 8 से 10 घंटे बैठकर काम करते हैं और उनकी शारीरिक गतिविधि केवल घर से कार्यालय और कार्यालय से घर तक सीमित रह जाती है।
मुंबई के जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रिया मेहता का कहना है कि आधुनिक समाज में टेक्नोलॉजी ने हमारे जीवन को सुविधाजनक तो बना दिया है लेकिन साथ ही हमें शारीरिक रूप से अत्यधिक आलसी भी बना दिया है, और यही कारण है कि आजकल 30 से 35 वर्ष की आयु के युवाओं में भी दिल के दौरे के मामले बढ़ते जा रहे हैं। उनका मानना है कि यदि लोग प्रतिदिन केवल 30 से 45 मिनट का समय व्यायाम, योगा, तेज चलना या साइकिलिंग जैसी गतिविधियों के लिए निकालें तो हृदय रोगों की घटनाओं में 40 से 50 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
भारतीय परिदृश्य: देश में बढ़ता हृदय रोगों का बोझ
भारत में हृदय रोगों की स्थिति अत्यंत गंभीर होती जा रही है और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 28 लाख लोग हृदय रोगों से प्रभावित होते हैं और इनमें से लगभग 25 से 30 प्रतिशत मामले घातक साबित होते हैं। विशेष चिंता की बात यह है कि पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों में हृदय रोग लगभग एक दशक पहले यानी कम उम्र में ही प्रकट होने लगते हैं, जिसका मुख्य कारण आनुवंशिक प्रवृत्ति, खान-पान की खराब आदतें और शारीरिक निष्क्रियता माना जाता है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा किए गए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में यह पाया गया कि शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 65 प्रतिशत वयस्क और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 45 प्रतिशत वयस्क विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित न्यूनतम शारीरिक गतिविधि के मानकों को पूरा नहीं कर पाते हैं। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, मशीनीकरण और डिजिटल क्रांति ने लोगों की जीवनशैली को इस कदर बदल दिया है कि आज का औसत भारतीय अपने पूर्वजों की तुलना में 70 प्रतिशत कम शारीरिक श्रम करता है, जो हृदय स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है।
शारीरिक निष्क्रियता के अन्य स्वास्थ्य परिणाम: केवल हृदय तक सीमित नहीं
यद्यपि यह शोध मुख्य रूप से शारीरिक निष्क्रियता और हृदयाघात के बीच के संबंध पर केंद्रित है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान ने यह भी स्थापित किया है कि गतिहीन जीवनशैली अनेक अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को भी जन्म देती है। मधुमेह टाइप 2 का सीधा संबंध शारीरिक निष्क्रियता से है क्योंकि जब हम व्यायाम नहीं करते हैं तो हमारे शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता खो देती हैं, जिससे रक्त शर्करा का स्तर बढ़ता जाता है। इसके अलावा, मोटापा, उच्च रक्तचाप, हड्डियों का कमजोर होना यानी ऑस्टियोपोरोसिस, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं जैसे अवसाद और चिंता, और यहां तक कि कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम भी शारीरिक निष्क्रियता से जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित शारीरिक गतिविधि केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। जब हम व्यायाम करते हैं तो हमारे मस्तिष्क में एंडोर्फिन नामक रसायन स्रावित होते हैं जो प्राकृतिक रूप से मूड को बेहतर बनाते हैं और तनाव को कम करते हैं। इसलिए, शारीरिक गतिविधि को जीवन का हिस्सा बनाना समग्र स्वास्थ्य और कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
व्यायाम की सही मात्रा: कितना और कैसे करें शारीरिक गतिविधि
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन जैसे प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संगठनों ने वयस्कों के लिए शारीरिक गतिविधि के स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके अनुसार एक स्वस्थ व्यक्ति को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता की एरोबिक गतिविधि या 75 मिनट की उच्च तीव्रता की एरोबिक गतिविधि अवश्य करनी चाहिए। मध्यम तीव्रता की गतिविधियों में तेज चलना, साइकिल चलाना, तैराकी, बागवानी और नृत्य शामिल हैं, जबकि उच्च तीव्रता की गतिविधियों में दौड़ना, एरोबिक्स, भारी वजन उठाना और प्रतिस्पर्धी खेल शामिल हैं।
हालांकि, यदि कोई व्यक्ति पहले से शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहा है तो उसे अचानक से तीव्र व्यायाम शुरू नहीं करना चाहिए बल्कि धीरे-धीरे अपनी गतिविधि का स्तर बढ़ाना चाहिए। शुरुआत में प्रतिदिन 10 से 15 मिनट की हल्की सैर या स्ट्रेचिंग से शुरुआत करके धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर 30 से 45 मिनट तक ले जाया जा सकता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि व्यायाम को अपनी दैनिक दिनचर्या का स्वाभाविक हिस्सा बनाना चाहिए न कि इसे एक बोझ के रूप में देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का उपयोग करना, छोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का उपयोग करना, कार्यालय में हर घंटे थोड़ा खड़े होकर स्ट्रेचिंग करना, और परिवार के साथ शाम को खेल गतिविधियों में शामिल होना जैसी छोटी-छोटी आदतें भी बड़ा प्रभाव डाल सकती हैं।
हृदय स्वास्थ्य के लिए आहार और जीवनशैली में अन्य परिवर्तन
केवल शारीरिक गतिविधि ही पर्याप्त नहीं है बल्कि हृदय को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि आहार में ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, मेवे और बीज को प्रमुखता से शामिल करना चाहिए क्योंकि ये खाद्य पदार्थ फाइबर, विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं जो हृदय को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। साथ ही, संतृप्त वसा, ट्रांस फैट, अत्यधिक नमक और शर्करा युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना चाहिए।
धूम्रपान और तंबाकू का सेवन हृदय रोगों के लिए सबसे बड़े जोखिम कारकों में से एक है और इसे पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए। शराब का सेवन यदि करना हो तो अत्यंत सीमित मात्रा में करना चाहिए। तनाव प्रबंधन भी हृदय स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि लगातार तनाव में रहने से रक्तचाप बढ़ता है और हृदय पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। योग, ध्यान, गहरी सांस लेने के व्यायाम और पर्याप्त नींद लेना तनाव को कम करने और हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं।
तकनीक का उपयोग: फिटनेस ट्रैकिंग और डिजिटल स्वास्थ्य उपकरण
आधुनिक युग में तकनीक ने शारीरिक गतिविधियों को ट्रैक करने और स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शुरू कर दिया है। स्मार्टवॉच, फिटनेस बैंड और मोबाइल ऐप्लिकेशन हमारे दैनिक कदम, कैलोरी बर्न, हृदय गति, नींद की गुणवत्ता और अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मापदंडों को रिकॉर्ड करते हैं और हमें हमारी प्रगति के बारे में तत्काल प्रतिक्रिया प्रदान करते हैं। ये उपकरण लोगों को प्रेरित रखने और उन्हें अपने स्वास्थ्य लक्ष्यों के प्रति जवाबदेह बनाने में मदद करते हैं।
कई स्वास्थ्य ऐप्लिकेशन व्यक्तिगत व्यायाम योजनाएं, आहार सुझाव और स्वास्थ्य चुनौतियां भी प्रदान करते हैं जो लोगों को नियमित रूप से सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। टेलीमेडिसिन और वर्चुअल फिटनेस कोचिंग ने भी लोगों के लिए घर बैठे विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त करना संभव बना दिया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक केवल एक सहायक उपकरण है और वास्तविक परिवर्तन तभी आता है जब व्यक्ति अपनी जीवनशैली में स्थायी बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध होता है।
सरकारी पहल और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम
भारत सरकार ने हृदय रोगों और अन्य गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ को देखते हुए कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू किए हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जिनमें समुदाय स्तर पर स्वास्थ्य जागरूकता अभियान, नियमित स्वास्थ्य जांच शिविर और जोखिम कारकों की पहचान और प्रबंधन शामिल हैं। फिट इंडिया मूवमेंट जैसी पहलें लोगों को शारीरिक रूप से सक्रिय रहने और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।


विभिन्न राज्य सरकारों ने भी अपने स्तर पर सार्वजनिक पार्क, खेल सुविधाएं और फिटनेस सेंटर स्थापित करने के लिए पहल की है ताकि लोगों के लिए शारीरिक गतिविधियों में भाग लेना आसान हो सके। स्कूलों और कॉलेजों में भी शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया जा रहा है और युवाओं को खेल और व्यायाम के प्रति प्रोत्साहित किया जा रहा है। कार्यस्थलों पर भी कर्मचारियों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए व्यायाम सुविधाएं, योग कक्षाएं और स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
कार्यस्थल पर स्वास्थ्य: कॉर्पोरेट जगत में बढ़ती जागरूकता
कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी अब यह समझा जा रहा है कि कर्मचारियों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य उत्पादकता और कार्यदक्षता से सीधे जुड़ा हुआ है। कई बड़ी कंपनियां अब कर्मचारियों के लिए जिम सुविधाएं, योग और ध्यान कक्षाएं, स्वास्थ्य बीमा और नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधाएं प्रदान कर रही हैं। कुछ संगठनों ने तो अपने कर्यालयों में स्टैंडिंग डेस्क, ट्रेडमिल डेस्क और अन्य एर्गोनॉमिक फर्नीचर भी उपलब्ध कराया है ताकि कर्मचारी लंबे समय तक बैठे रहने से होने वाले नुकसान से बच सकें।
कुछ प्रगतिशील कंपनियां अपने कर्मचारियों को कार्य समय के दौरान व्यायाम के लिए विशेष ब्रेक देती हैं और उन्हें शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहन भी प्रदान करती हैं। टीम बिल्डिंग गतिविधियों के रूप में आउटडोर खेल और साहसिक गतिविधियों का आयोजन भी किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब संगठन अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य में निवेश करते हैं तो इससे न केवल कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढ़ती है बल्कि बीमारी के कारण छुट्टी लेने की दर में भी कमी आती है, जो दीर्घकालिक रूप से संगठन के लिए भी लाभदायक होता है।
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बच्चों और युवाओं में शारीरिक गतिविधि का महत्व
हृदय स्वास्थ्य की नींव बचपन से ही रखी जाती है और इसलिए बच्चों और युवाओं को शारीरिक रूप से सक्रिय रहने की आदत डालना अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों के अनुसार 5 से 17 वर्ष की आयु के बच्चों और किशोरों को प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट की मध्यम से तीव्र शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। दुर्भाग्य से, आधुनिक समय में बच्चे अधिकतर समय मोबाइल फोन, वीडियो गेम और टेलीविजन के सामने बिताते हैं और शारीरिक खेलों में उनकी रुचि लगातार कम होती जा रही है।
माता-पिता और शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को आउटडोर खेलों और शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें। स्कूलों में खेल और शारीरिक शिक्षा को केवल औपचारिकता न मानकर गंभीरता से लागू किया जाना चाहिए। बच्चों को विभिन्न खेलों और व्यायाम के प्रकारों से परिचित कराया जाना चाहिए ताकि वे अपनी रुचि के अनुसार कुछ चुन सकें। परिवार के साथ सैर, साइकिलिंग, तैराकी और अन्य मनोरंजक गतिविधियां भी बच्चों में शारीरिक गतिविधि के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करती हैं।
वृद्धजनों के लिए सुरक्षित और प्रभावी व्यायाम
बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक गतिविधि का महत्व कम नहीं होता बल्कि और भी अधिक बढ़ जाता है क्योंकि नियमित व्यायाम वृद्धजनों में हृदय रोग, मधुमेह, ऑस्टियोपोरोसिस और गठिया जैसी समस्याओं के जोखिम को कम करता है और उनकी गतिशीलता, संतुलन और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है। हालांकि, वृद्धजनों को व्यायाम शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए और धीरे-धीरे तथा सुरक्षित तरीके से अपनी गतिविधि बढ़ानी चाहिए।
वृद्धजनों के लिए उपयुक्त व्यायामों में हल्की सैर, योग, ताई ची, तैराकी, और कुर्सी पर बैठकर किए जाने वाले व्यायाम शामिल हैं। संतुलन और लचीलापन बढ़ाने वाले व्यायाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये गिरने के जोखिम को कम करते हैं। हल्के वजन उठाने या प्रतिरोध बैंड का उपयोग करने से मांसपेशियों की शक्ति बनाए रखने में मदद मिलती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि वृद्धजनों को किसी मित्र या परिवार के सदस्य के साथ व्यायाम करना चाहिए ताकि व्यायाम सुरक्षित और सामाजिक रूप से आनंददायक हो।
निष्कर्ष: स्वस्थ हृदय के लिए सक्रिय जीवन की ओर
यह शोध और इसके निष्कर्ष हमारे सामने एक स्पष्ट संदेश रखते हैं कि शारीरिक निष्क्रियता केवल एक जीवनशैली विकल्प नहीं बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है जो हृदयाघात सहित अनेक घातक बीमारियों को जन्म दे सकता है। आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं और तकनीकी सुविधाओं ने हमें इतना आरामतलब बना दिया है कि हम अपने शरीर की मूलभूत आवश्यकता यानी नियमित शारीरिक गतिविधि को भूल गए हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि यह एक ऐसा जोखिम कारक है जिसे हम अपनी इच्छा और प्रयास से पूरी तरह नियंत्रित कर सकते हैं।
हमें यह समझना होगा कि स्वास्थ्य हमारी सबसे बड़ी संपत्ति है और इसकी रक्षा के लिए हमें प्रतिदिन सचेत प्रयास करने होंगे। शारीरिक गतिविधि को जीवन का अभिन्न अंग बनाना, संतुलित आहार लेना, तनाव का प्रबंधन करना और नियमित स्वास्थ्य जांच कराना हृदय रोगों से बचाव की कुंजी है। सरकारी पहलों, चिकित्सा समुदाय की सलाह और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता के माध्यम से हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं जहां हृदय रोगों का बोझ काफी कम हो।
विशेषज्ञों का यह स्पष्ट मत है कि यदि भारतीय समाज अपनी जीवनशैली में सुधार लाए और शारीरिक गतिविधियों को प्राथमिकता दे तो आने वाले दशक में हृदय रोगों से होने वाली मृत्यु दर में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है। यह केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ को कम करने और देश की उत्पादकता बढ़ाने में भी सहायक होगा। इसलिए, आइए हम सभी मिलकर संकल्प लें कि हम अपने और अपने प्रियजनों के स्वस्थ हृदय और लंबे जीवन के लिए शारीरिक रूप से सक्रिय जीवनशैली अपनाएंगे और इस संदेश को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाएंगे।
संदर्भ और स्रोत: यह लेख विभिन्न प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध अध्ययनों, विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों, अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की सिफारिशों, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के आंकड़ों और प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञों के साक्षात्कारों पर आधारित है। शारीरिक निष्क्रियता और हृदय रोगों पर किए गए हालिया शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर की चिकित्सा पत्रिकाओं में प्रकाशित किए गए हैं और इनकी समीक्षा विशेषज्ञों द्वारा की गई है।