भारत का महत्वाकांक्षी लक्ष्य: ‘विश्व की फार्मेसी’ से 2026 तक वैश्विक लाइफ साइंसेज हब बनने की तैयारी
भारत जेनेरिक दवाओं के निर्माण से आगे बढ़कर नवाचार, बायोटेक, डिजिटल हेल्थ और R&D में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है। कड़े गुणवत्ता मानक, सरकारी नीतियां और निजी निवेश कैसे भारत को लाइफ साइंसेज हब बना सकते हैं—जानिए पूरी तस्वीर।
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भारत का महत्वाकांक्षी लक्ष्य: विश्व की फार्मेसी से वैश्विक जीवन विज्ञान केंद्र तक का सफर
नई दिल्ली: भारत, जो पिछले तीन दशकों से "विश्व की फार्मेसी" के रूप में विख्यात रहा है, अब 2026 तक एक नए और अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहा है जो है एक समग्र वैश्विक जीवन विज्ञान केंद्र (Global Life Sciences Hub) के रूप में स्थापित होना। यह परिवर्तन केवल शब्दों का खेल नहीं बल्कि भारतीय फार्मास्युटिकल और जैव प्रौद्योगिकी उद्योग में एक मूलभूत बदलाव का संकेत है, जिसमें कड़े औषधि गुणवत्ता मानक, नवाचार को बढ़ावा और डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना का विस्तार शामिल है। केंद्र सरकार, राज्य प्रशासन, नियामक निकाय और निजी क्षेत्र की कंपनियां इस दिशा में एकजुट होकर कार्य कर रही हैं ताकि भारत न केवल जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्माता बना रहे बल्कि अनुसंधान, विकास और नवाचार में भी वैश्विक अग्रणी के रूप में उभरे।
विश्व की फार्मेसी से आगे: एक नए युग की शुरुआत
भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा उद्योग है और मात्रा की दृष्टि से विश्व में सबसे बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक है। भारतीय फार्मास्युटिकल एलायंस (IPA) के 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, भारत वैश्विक जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत और संयुक्त राज्य अमेरिका में उपयोग होने वाली जेनेरिक दवाओं का 40 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करता है। विश्व के 200 से अधिक देशों में भारतीय दवाओं की आपूर्ति होती है और भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग का वार्षिक कारोबार लगभग 50 बिलियन डॉलर (4.2 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच गया है।
हालांकि इन प्रभावशाली आंकड़ों के बावजूद, भारतीय फार्मा उद्योग लंबे समय से एक महत्वपूर्ण चुनौती का सामना कर रहा था - यह मुख्य रूप से जेनेरिक दवाओं के निर्माण तक सीमित था और अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश अन्य विकसित देशों की तुलना में काफी कम था। भारतीय फार्मा कंपनियां अपने राजस्व का मात्र 2-3 प्रतिशत अनुसंधान और विकास पर खर्च करती थीं जबकि वैश्विक फार्मा दिग्गज कंपनियां अपने राजस्व का 15-20 प्रतिशत R&D में निवेश करती हैं।
भारतीय औषधि निर्माता संघ (IDMA) के अध्यक्ष और वरिष्ठ उद्योग विशेषज्ञ श्री दामोदरन ने एक साक्षात्कार में कहा, "भारतीय फार्मा उद्योग एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। हम जेनेरिक दवाओं में वैश्विक नेता हैं लेकिन अब समय आ गया है कि हम नवाचार, जैव प्रौद्योगिकी, व्यक्तिगत चिकित्सा (Personalized Medicine) और डिजिटल स्वास्थ्य समाधानों में भी अग्रणी बनें। सरकार की नई नीतियां और पहल इस दिशा में सकारात्मक कदम हैं।"
औषधि गुणवत्ता मानकों में सुधार: विश्वास और प्रतिष्ठा का प्रश्न
भारतीय दवाओं की गुणवत्ता को लेकर पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ चिंताएं उठी थीं। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) और यूरोपियन मेडिसिन्स एजेंसी (EMA) द्वारा कुछ भारतीय निर्माण इकाइयों पर चेतावनी पत्र जारी किए गए थे और कुछ मामलों में उत्पादन रोकने के आदेश भी दिए गए थे। इन घटनाओं ने भारतीय फार्मा उद्योग की वैश्विक प्रतिष्ठा को प्रभावित किया और यह स्पष्ट हो गया कि गुणवत्ता मानकों में सुधार अत्यंत आवश्यक है।
इस चुनौती को स्वीकार करते हुए, भारतीय औषधि महानियंत्रक (Drugs Controller General of India - DCGI) और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (Central Drugs Standard Control Organization - CDSCO) ने 2024-25 में कड़े नियामक सुधार लागू किए हैं। नए दिशानिर्देशों के अनुसार, सभी औषधि निर्माण इकाइयों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के सुव्यवस्थित विनिर्माण अभ्यास (Good Manufacturing Practices - GMP) मानकों का अनुपालन अनिवार्य कर दिया गया है।
CDSCO के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. वी.जी. सोमानी बताते हैं, "हमने औषधि निर्माण इकाइयों के निरीक्षण की आवृत्ति बढ़ा दी है और निरीक्षण प्रक्रिया को अधिक व्यापक और कठोर बनाया है। अब हम केवल अंतिम उत्पाद की जांच नहीं करते बल्कि संपूर्ण उत्पादन प्रक्रिया, कच्चे माल की गुणवत्ता, भंडारण सुविधाएं और गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं का भी सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं।"
केंद्र सरकार ने राज्य औषधि नियंत्रकों के लिए एक समान मानक ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल (Standard Operating Protocol) भी लागू किया है ताकि देश भर में औषधि गुणवत्ता नियंत्रण में एकरूपता बनी रहे। इसके अलावा, नकली और निम्न गुणवत्ता की दवाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए विशेष कार्यबल का गठन किया गया है।
नवाचार को बढ़ावा: अनुसंधान और विकास में निवेश
भारत को वैश्विक जीवन विज्ञान केंद्र बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम अनुसंधान और विकास में बड़े पैमाने पर निवेश को प्रोत्साहित करना है। इस दिशा में भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण पहल की हैं जिनमें नेशनल बायोफार्मा मिशन, जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) के माध्यम से स्टार्टअप्स को फंडिंग और फार्मा एवं मेडिकल डिवाइस पार्कों की स्थापना शामिल हैं।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology) ने 2025 में "फार्मा इनोवेशन फंड" की स्थापना की है जिसके तहत नवीन औषधि अनुसंधान परियोजनाओं के लिए 5000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। यह फंड विशेष रूप से उन परियोजनाओं को समर्थन देगा जो कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और तंत्रिका संबंधी विकारों के लिए नवीन चिकित्सा समाधान विकसित कर रही हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय कुमार कहते हैं, "भारत में प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की कोई कमी नहीं है। जो कमी थी वह थी पर्याप्त फंडिंग, अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाओं और उद्योग-अकादमिया सहयोग की। सरकार की नई पहलें इन खाइयों को पाट रही हैं और हम आने वाले वर्षों में भारत से कई नवीन औषधियों और चिकित्सा प्रौद्योगिकियों के आने की उम्मीद कर सकते हैं।"
कुछ भारतीय फार्मा कंपनियां पहले ही नवाचार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा चुकी हैं। उदाहरण के लिए, डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज ने जटिल जेनेरिक दवाओं और बायोसिमिलर के विकास में महत्वपूर्ण निवेश किया है। सिप्ला ने श्वसन रोगों के लिए नवीन इनहेलर तकनीक विकसित की है जबकि बायोकॉन ने जैव-समान (Biosimilar) दवाओं में अग्रणी भूमिका निभाई है।
जैव प्रौद्योगिकी: भविष्य की चिकित्सा का आधार
जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का सबसे तेजी से विकसित हो रहा क्षेत्र है और भारत इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति कर रहा है। भारतीय बायोटेक उद्योग का वार्षिक कारोबार 2024-25 में लगभग 80 बिलियन डॉलर (6.7 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच गया है और यह 15-20 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रहा है।
भारत में बायोसिमिलर (जैविक दवाओं के समान प्रतिरूप), वैक्सीन, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और जीन थेरेपी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुसंधान हो रहा है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने अपनी वैक्सीन विकास और उत्पादन क्षमता का प्रदर्शन किया जब कोवैक्सिन और कोविशील्ड जैसे टीके न केवल भारत में बल्कि विश्व के कई देशों में आपूर्ति किए गए।
बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के जैव विज्ञान विभाग की प्रोफेसर डॉ. मीरा नायर कहती हैं, "जैव प्रौद्योगिकी में भारत की क्षमता अपार है। हमारे पास उत्कृष्ट शोध संस्थान, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और बढ़ती हुई निवेश क्षमता है। अगले दशक में भारत जैव प्रौद्योगिकी आधारित चिकित्सा में वैश्विक अग्रणी बन सकता है।"
भारत सरकार ने जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र को विशेष प्राथमिकता देते हुए कई बायोटेक पार्क और इनक्यूबेशन केंद्र स्थापित किए हैं। पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु और गुड़गांव में विश्वस्तरीय बायोटेक क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं जहां अनुसंधान, विकास और उत्पादन के लिए आवश्यक सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना: तकनीक और चिकित्सा का संगम
डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना भारत की जीवन विज्ञान महत्वाकांक्षा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। भारत सरकार का आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (Ayushman Bharat Digital Mission - ABDM) इस दिशा में एक क्रांतिकारी पहल है जिसका उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को एक अद्वितीय डिजिटल स्वास्थ्य पहचान (Unique Health ID) प्रदान करना और स्वास्थ्य रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से एकीकृत करना है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (National Health Authority) के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2024 तक 50 करोड़ से अधिक भारतीयों ने अपना आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता (ABHA) बनाया है और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड, टेलीमेडिसिन सेवाएं, डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन और ऑनलाइन दवा वितरण शामिल हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. आर.एस. शर्मा बताते हैं, "डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना केवल सुविधा का मामला नहीं है बल्कि यह स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, पहुंच और दक्षता में क्रांतिकारी सुधार ला सकती है। जब एक मरीज का संपूर्ण स्वास्थ्य इतिहास डिजिटल रूप में उपलब्ध होता है तो डॉक्टर बेहतर निर्णय ले सकते हैं, दवाओं की आपसी प्रतिक्रिया से बचा जा सकता है और आपातकालीन स्थितियों में तत्काल उपचार संभव हो जाता है।"
डिजिटल स्वास्थ्य के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) और मशीन लर्निंग का उपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय स्टार्टअप्स ने AI आधारित निदान उपकरण, दवा खोज प्लेटफॉर्म और व्यक्तिगत उपचार योजना प्रणाली विकसित की हैं। नैनो हेल्थ, प्रेडिक्टिव हेल्थकेयर और क्योर.एआई जैसे भारतीय स्टार्टअप्स इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।
सरकारी पहल और नीतिगत सुधार
भारत सरकार ने फार्मा और जीवन विज्ञान क्षेत्र के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण नीतिगत पहल की हैं। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना के तहत फार्मास्युटिकल क्षेत्र के लिए 15000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जो घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और आयात निर्भरता कम करने के लिए है।
विशेष रूप से एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) और की स्टार्टिंग मटीरियल्स (KSM) के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की चीन पर API आयात निर्भरता एक चिंता का विषय रही है और PLI योजना इस समस्या का समाधान करने का प्रयास है।
केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने फार्मा पार्कों की स्थापना के लिए राज्यों को विशेष प्रोत्साहन दिया है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बड़े फार्मा पार्क विकसित किए जा रहे हैं जहां विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा, कॉमन इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट और सिंगल विंडो क्लियरेंस की सुविधा उपलब्ध है।
औषधि नियामक प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। नई दवाओं के अनुमोदन की प्रक्रिया को तेज और अधिक पारदर्शी बनाया गया है। क्लिनिकल ट्रायल नियमों में सुधार से भारत में दवा परीक्षण अधिक आकर्षक हो गया है और कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत में क्लिनिकल ट्रायल कर रही हैं।
चुनौतियां और समाधान
भले ही प्रगति उत्साहजनक है लेकिन कई चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं - अनुसंधान और विकास में अपर्याप्त निवेश, बौद्धिक संपदा अधिकारों की जटिलताएं, कुशल मानव संसाधन की कमी और वैश्विक नियामक मानकों को पूरा करने में कठिनाइयां।
भारतीय फार्मा कंपनियों को अपने R&D खर्च को काफी बढ़ाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कंपनियों को अपने राजस्व का कम से कम 8-10 प्रतिशत अनुसंधान और विकास में निवेश करना होगा यदि वे वैश्विक नवाचार में प्रतिस्पर्धी बनना चाहती हैं।
मुंबई स्थित फार्मा परामर्श फर्म के निदेशक श्री राजीव मल्होत्रा कहते हैं, "भारतीय फार्मा उद्योग एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। हमें जेनेरिक निर्माण की अपनी मजबूती को बनाए रखते हुए नवाचार और उच्च मूल्य उत्पादों की ओर बढ़ना होगा। यह आसान नहीं है लेकिन आवश्यक है।"
बौद्धिक संपदा अधिकारों के मामले में भी स्पष्टता और सुधार की आवश्यकता है। भारत को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो एक ओर नवाचार को पुरस्कृत करें और दूसरी ओर किफायती दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करें।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और भागीदारी
भारत की जीवन विज्ञान महत्वाकांक्षा को साकार करने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कई वैश्विक फार्मा कंपनियों ने भारत में अनुसंधान केंद्र स्थापित किए हैं। फाइजर, नोवार्टिस, जॉनसन एंड जॉनसन, एस्ट्राजेनेका और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत में R&D केंद्र हैं जो न केवल भारतीय बाजार बल्कि वैश्विक बाजार के लिए दवा विकास में संलग्न हैं।
भारत-अमेरिका, भारत-यूरोपीय संघ और भारत-जापान के बीच जीवन विज्ञान और स्वास्थ्य क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग समझौते हैं। ये साझेदारियां अनुसंधान सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और नियामक सामंजस्य को सुगम बना रही हैं।
भारतीय फार्मा कंपनियां भी अंतरराष्ट्रीय अधिग्रहण और साझेदारी के माध्यम से विस्तार कर रही हैं। सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, लूपिन और अन्य भारतीय कंपनियों ने विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण किया है और वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति मजबूत की है।
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2026 तक की रोडमैप और अपेक्षाएं
2026 तक भारत को वैश्विक जीवन विज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर हासिल करने होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, निम्नलिखित लक्ष्य प्राथमिकता पर हैं:
गुणवत्ता मानकों में सुधार: 2026 तक सभी प्रमुख भारतीय फार्मा निर्माण इकाइयों को US FDA और EMA मानकों के अनुरूप प्रमाणित किया जाना चाहिए।
नवाचार में वृद्धि: कम से कम 10 नए भारतीय मूल के अणु (New Chemical Entities - NCE) क्लिनिकल ट्रायल के विभिन्न चरणों में होने चाहिए।
बायोटेक विस्तार: जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र का कारोबार 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचना चाहिए।
डिजिटल एकीकरण: 75 करोड़ से अधिक भारतीयों को डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ा जाना चाहिए।
निर्यात वृद्धि: भारतीय फार्मा निर्यात 40 बिलियन डॉलर से बढ़कर 60 बिलियन डॉलर तक पहुंचना चाहिए।
निष्कर्ष: एक नए युग की ओर
भारत का "विश्व की फार्मेसी" से "वैश्विक जीवन विज्ञान केंद्र" बनने का सफर केवल एक औद्योगिक परिवर्तन नहीं बल्कि राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह यात्रा चुनौतीपूर्ण है लेकिन भारत के पास आवश्यक संसाधन, प्रतिभा और संकल्प है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल कहते हैं, "भारत की जीवन विज्ञान क्षेत्र में क्षमता असीमित है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है, उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थान हैं और बढ़ती हुई आर्थिक शक्ति है। सरकार, उद्योग और अकादमिया के बीच मजबूत साझेदारी के साथ, हम 2030 तक वैश्विक जीवन विज्ञान में शीर्ष तीन देशों में शामिल हो सकते हैं।"
यह परिवर्तन न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण है। एक मजबूत, नवाचारी और गुणवत्तापूर्ण भारतीय जीवन विज्ञान क्षेत्र विश्व के अरबों लोगों को किफायती और प्रभावी स्वास्थ्य समाधान प्रदान कर सकता है।
संदर्भ और स्रोत:
यह लेख निम्नलिखित विश्वसनीय स्रोतों और संस्थानों के आंकड़ों, रिपोर्टों और विशेषज्ञ परामर्श पर आधारित है:
भारतीय फार्मास्युटिकल एलायंस (IPA) - उद्योग रिपोर्ट 2024-25
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) - नियामक दिशानिर्देश
भारतीय औषधि निर्माता संघ (IDMA) - वार्षिक रिपोर्ट
जैव प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार - नीति दस्तावेज
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) - आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन रिपोर्ट
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) - शोध प्रकाशन
केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय - फार्मा क्षेत्र नीतियां
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) बेंगलुरु - जैव विज्ञान अनुसंधान
लेखक नोट: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न सरकारी, उद्योग और शैक्षणिक स्रोतों से संकलित की गई है और यह जनवरी 2026 तक के आंकड़ों और नीतियों पर आधारित है। उद्योग की गतिशील प्रकृति को देखते हुए कुछ सूचनाएं समय के साथ बदल सकती हैं।