WHO का ऐतिहासिक कदम: आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा को वैश्विक मान्यता देने की दिशा में बड़ी पहल
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ICD-11 के तहत आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा की वैश्विक कोडिंग प्रक्रिया शुरू की। यह पहल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे में औपचारिक मान्यता दिलाने की दिशा में एक मील का पत्थर मानी जा रही है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक मान्यता की ओर बढ़ाया: भारतीय पारंपरिक चिकित्सा के लिए ऐतिहासिक कदम
जिनेवा और नई दिल्ली से आई ताज़ा रिपोर्ट्स के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों – आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी – की वैश्विक कोडिंग प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो इन हजारों साल पुरानी चिकित्सा प्रणालियों को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे में औपचारिक मान्यता दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। यह पहल न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व में पारंपरिक चिकित्सा के प्रति बढ़ते विश्वास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को दर्शाती है, जहां आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा के साथ-साथ वैकल्पिक और पूरक चिकित्सा प्रणालियों को भी समान महत्व और स्थान मिलना शुरू हो गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा शुरू की गई यह कोडिंग प्रक्रिया इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीजेज (ICD) के नवीनतम संस्करण ICD-11 के तहत संचालित की जा रही है, जिसमें पारंपरिक चिकित्सा के निदान, उपचार और दवाओं को एक मानकीकृत कोडिंग सिस्टम के माध्यम से वर्गीकृत किया जाएगा।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा में प्रयोग होने वाली बीमारियों के निदान, उपचार विधियों, औषधियों और थेरेपी को एक वैश्विक मानक के अनुरूप दस्तावेजीकृत करना है, ताकि दुनिया भर के स्वास्थ्य पेशेवर, शोधकर्ता और नीति निर्माता इन पद्धतियों को बेहतर ढंग से समझ सकें और इनका उपयोग कर सकें।
पारंपरिक भारतीय चिकित्सा का वैश्विक परिदृश्य में समावेश
भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां हजारों वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप और एशिया के विभिन्न हिस्सों में लाखों लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण का आधार रही हैं, लेकिन आधुनिक युग में इन्हें वैज्ञानिक मान्यता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति दिलाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाते रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इन चिकित्सा पद्धतियों की कोडिंग शुरू करना इस दिशा में एक बड़ी सफलता है, जो भारत सरकार के आयुष मंत्रालय और विभिन्न शोध संस्थानों के दीर्घकालिक प्रयासों का परिणाम है।
आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, यह कदम भारतीय पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में एकीकृत करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा, क्योंकि इससे न केवल इन पद्धतियों की वैज्ञानिक विश्वसनीयता बढ़ेगी बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनके व्यापार, शोध और नैदानिक उपयोग के लिए भी नए रास्ते खुलेंगे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस पहल से यह संभावना बनती है कि आने वाले समय में विभिन्न देशों की स्वास्थ्य प्रणालियां आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा को अपनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में शामिल करने पर विचार करेंगी।
आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी: प्राचीन ज्ञान की आधुनिक व्याख्या
आयुर्वेद, जिसका अर्थ "जीवन का विज्ञान" है, भारत की सबसे प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में से एक है जो लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है और इसका आधार वेदों में वर्णित ज्ञान और प्राकृतिक उपचार के सिद्धांतों पर टिका हुआ है।
आयुर्वेद में शरीर को पंच महाभूतों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – से निर्मित माना जाता है और तीन मुख्य दोषों – वात, पित्त और कफ – के संतुलन को स्वास्थ्य का आधार माना गया है। आयुर्वेदिक उपचार में जड़ी-बूटियों, खनिजों, योग, ध्यान, आहार नियंत्रण और जीवनशैली में बदलाव को प्रमुखता दी जाती है।
सिद्ध चिकित्सा पद्धति मुख्य रूप से दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में प्रचलित है और यह भी हजारों साल पुरानी परंपरा का हिस्सा है, जिसे सिद्धों या ज्ञानी संतों द्वारा विकसित किया गया था। सिद्ध चिकित्सा में रसायन विज्ञान, धातुओं और खनिजों का व्यापक उपयोग होता है और इसमें शरीर की ऊर्जा चैनलों को संतुलित करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यह पद्धति न केवल रोगों के उपचार बल्कि दीर्घायु और आध्यात्मिक विकास पर भी जोर देती है।
यूनानी चिकित्सा, जिसकी उत्पत्ति प्राचीन ग्रीस में हुई थी और बाद में अरब और फारसी चिकित्सकों द्वारा विकसित की गई, भारत में मुगल काल के दौरान लोकप्रिय हुई और आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापक रूप से प्रचलित है।
यूनानी चिकित्सा चार मूलभूत तत्वों – अग्नि, जल, वायु और मृदा – और चार शारीरिक द्रवों (humors) – रक्त, कफ, पीला पित्त और काला पित्त – के संतुलन पर आधारित है। इस पद्धति में प्राकृतिक औषधियों, आहार चिकित्सा और शारीरिक उपचारों का समन्वय किया जाता है।
ICD-11 में पारंपरिक चिकित्सा का समावेश: तकनीकी और वैज्ञानिक पहलू
विश्व स्वास्थ्य संगठन की इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीजेज (ICD) प्रणाली वैश्विक स्वास्थ्य सांख्यिकी का आधार है, जिसका उपयोग दुनिया भर में बीमारियों, चोटों, मृत्यु के कारणों और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों को वर्गीकृत और कोड करने के लिए किया जाता है। ICD-11, जो 2022 में आधिकारिक तौर पर लागू हुआ, पहली बार पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक समर्पित अध्याय – Chapter 26 – शामिल करता है, जिसे "Traditional Medicine Conditions - Module I" कहा जाता है।
इस अध्याय में मुख्य रूप से चीनी पारंपरिक चिकित्सा (Traditional Chinese Medicine) के निदान और उपचारों को शामिल किया गया है, लेकिन अब विश्व स्वास्थ्य संगठन आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा के लिए भी इसी तरह की कोडिंग प्रणाली विकसित करने की प्रक्रिया में है। यह कार्य अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसमें हजारों वर्षों के संस्कृत, तमिल, अरबी और फारसी साहित्य का अध्ययन करना, विभिन्न रोगों के पारंपरिक निदान को आधुनिक चिकित्सा शब्दावली से जोड़ना और हजारों औषधीय पौधों, सूत्रीकरणों और उपचार विधियों को मानकीकृत करना शामिल है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और आयुष मंत्रालय के तहत काम करने वाले विभिन्न शोध संस्थान, जैसे केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान और अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, इस प्रक्रिया में विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं। इन संस्थानों के विशेषज्ञों ने पारंपरिक चिकित्सा के शास्त्रीय ग्रंथों, जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, अष्टांग हृदय, और यूनानी चिकित्सा के कैनन ऑफ मेडिसिन जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों का गहन अध्ययन करके एक व्यापक डेटाबेस तैयार किया है।
वैश्विक मान्यता से भारतीय पारंपरिक चिकित्सा उद्योग को होने वाले लाभ
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा की कोडिंग और मान्यता से भारतीय पारंपरिक चिकित्सा उद्योग को कई स्तरों पर व्यापक लाभ होने की संभावना है। सबसे पहले, यह मान्यता अंतरराष्ट्रीय बाजार में आयुर्वेदिक और पारंपरिक उत्पादों की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता को बढ़ाएगी, जिससे निर्यात में वृद्धि होने की उम्मीद है। वर्तमान में भारतीय आयुष उत्पादों का वैश्विक बाजार लगभग 18 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है और विशेषज्ञों का मानना है कि WHO की मान्यता के बाद यह आंकड़ा अगले पांच वर्षों में दोगुना हो सकता है।
दूसरा, इस कोडिंग प्रणाली से पारंपरिक चिकित्सा में शोध और विकास को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि मानकीकृत डेटा और कोडिंग सिस्टम के माध्यम से वैज्ञानिक अध्ययन, नैदानिक परीक्षण और तुलनात्मक प्रभावशीलता अध्ययन करना आसान हो जाएगा। विश्व भर की फार्मास्युटिकल कंपनियां और अनुसंधान संस्थान आयुर्वेदिक औषधियों और सूत्रीकरणों में रुचि दिखा रहे हैं, क्योंकि इनमें से कई में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीऑक्सिडेंट, इम्यूनोमॉड्यूलेटरी और अन्य महत्वपूर्ण चिकित्सीय गुण पाए गए हैं।
तीसरा, स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में भी यह कदम महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकता है। जब पारंपरिक चिकित्सा का ICD कोडिंग सिस्टम में औपचारिक समावेश हो जाएगा, तो बीमा कंपनियां आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी उपचारों को अपनी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों में शामिल करने पर विचार कर सकेंगी, जिससे लाखों लोगों को इन उपचार पद्धतियों तक सस्ती पहुंच मिल सकेगी। वर्तमान में अधिकांश स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां केवल एलोपैथिक उपचार को ही कवर करती हैं, लेकिन WHO की मान्यता के बाद यह स्थिति बदल सकती है।
भारत सरकार की आयुष पहल और राष्ट्रीय रणनीति
भारत सरकार ने पिछले एक दशक में पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 2014 में स्वास्थ्य मंत्रालय से अलग होकर एक स्वतंत्र आयुष मंत्रालय की स्थापना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय था। मंत्रालय ने देश भर में आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी (AYUSH) की शिक्षा, अनुसंधान और सेवा वितरण को मजबूत करने के लिए व्यापक योजनाएं लागू की हैं।
राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत सरकार ने आयुष स्वास्थ्य केंद्रों, औषधालयों और अस्पतालों के नेटवर्क का विस्तार किया है, जिससे ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में भी लोगों को पारंपरिक चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हो सकें। 2022 तक देश भर में 3,000 से अधिक आयुष अस्पताल और 15,000 से अधिक औषधालय कार्यरत हैं, जहां प्रतिदिन लाखों मरीजों का उपचार होता है।
आयुष मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी प्राथमिकता दी है और विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते किए हैं ताकि भारतीय पारंपरिक चिकित्सा का विश्व स्तर पर प्रचार-प्रसार हो सके। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ सहयोग इसी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें भारत ने ICD-11 में पारंपरिक चिकित्सा के समावेश के लिए तकनीकी और वैज्ञानिक सहायता प्रदान की है।
वैज्ञानिक प्रमाणीकरण और नैदानिक परीक्षणों की आवश्यकता
हालांकि आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा का हजारों वर्षों का अनुभवजन्य ज्ञान और व्यावहारिक उपयोग है, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने के लिए इन पद्धतियों को कठोर नैदानिक परीक्षणों और वैज्ञानिक प्रमाणीकरण से गुजरना आवश्यक है। यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि पारंपरिक चिकित्सा का दृष्टिकोण समग्र (holistic) है और यह व्यक्तिगत संविधान (prakriti) और रोग की अवस्था के अनुसार उपचार को अनुकूलित करने पर जोर देता है, जबकि आधुनिक नैदानिक परीक्षण मानकीकृत प्रोटोकॉल और बड़े नमूना आकार पर आधारित होते हैं।
हाल के वर्षों में भारत और विदेशों में कई महत्वपूर्ण शोध अध्ययन किए गए हैं जो आयुर्वेदिक औषधियों और उपचारों की प्रभावशीलता को प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए, हल्दी (करक्यूमिन), अश्वगंधा, तुलसी, नीम और गिलोय जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों पर हुए शोधों ने इनके एंटी-इंफ्लेमेटरी, इम्यूनोमॉड्यूलेटरी और एंटीऑक्सिडेंट गुणों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया है। COVID-19 महामारी के दौरान भी आयुर्वेदिक उपचारों और इम्यूनिटी बूस्टर्स की भूमिका पर कई अध्ययन किए गए, जिनमें से कुछ ने सकारात्मक परिणाम दिखाए।
अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA), नई दिल्ली के एक वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. राजेश कोठारी के अनुसार, "आयुर्वेदिक औषधियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन एक जटिल प्रक्रिया है क्योंकि अधिकांश आयुर्वेदिक योग बहु-घटक सूत्रीकरण हैं जहां विभिन्न औषधीय पौधों का समन्वय एक सिनर्जिस्टिक प्रभाव उत्पन्न करता है। हमें ऐसे शोध प्रोटोकॉल विकसित करने की आवश्यकता है जो पारंपरिक चिकित्सा के समग्र दृष्टिकोण को बनाए रखते हुए आधुनिक वैज्ञानिक मानकों को भी पूरा करें।"
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय पारंपरिक चिकित्सा की स्वीकार्यता
पिछले दो दशकों में विश्व भर में पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा (Complementary and Alternative Medicine - CAM) के प्रति रुझान में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य विकसित देशों में लोग पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को स्वास्थ्य और कल्याण के लिए एक विकल्प या पूरक के रूप में अपना रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH), अमेरिका के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 38% अमेरिकी वयस्क किसी न किसी रूप में पूरक चिकित्सा का उपयोग करते हैं, जिसमें योग, ध्यान, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां और एक्यूपंक्चर जैसी पद्धतियां शामिल हैं।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय पारंपरिक चिकित्सा उत्पादों को कई नियामक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। विभिन्न देशों में आयुर्वेदिक और हर्बल उत्पादों के लिए अलग-अलग नियम और मानक हैं, और कई बार इन उत्पादों को औषधि की बजाय खाद्य पूरक (dietary supplement) की श्रेणी में रखा जाता है, जिससे इनके चिकित्सीय दावों पर प्रतिबंध लग जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मान्यता और कोडिंग से इन नियामक बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।
यूरोपीय संघ में हर्बल औषधियों के लिए European Medicines Agency (EMA) द्वारा जारी दिशानिर्देश काफी कठोर हैं और किसी भी आयुर्वेदिक उत्पाद को यूरोपीय बाजार में बेचने के लिए व्यापक सुरक्षा और प्रभावशीलता डेटा की आवश्यकता होती है। WHO की मान्यता इस प्रक्रिया को सरल बना सकती है और भारतीय कंपनियों के लिए यूरोपीय और अन्य विकसित बाजारों में प्रवेश करना आसान हो सकता है।
चुनौतियां और आलोचनात्मक दृष्टिकोण
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पारंपरिक चिकित्सा को मान्यता देने की प्रक्रिया के कुछ आलोचक भी हैं, जो मुख्य रूप से वैज्ञानिक समुदाय से आते हैं। उनका तर्क है कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में से अधिकांश के लिए उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक साक्ष्य की कमी है और इन्हें बिना पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाणीकरण के मान्यता देना छद्म-विज्ञान (pseudoscience) को बढ़ावा देने जैसा हो सकता है। कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि पारंपरिक चिकित्सा को मान्यता देने से लोग आधुनिक, साक्ष्य-आधारित चिकित्सा से दूर हो सकते हैं, जो गंभीर बीमारियों के मामले में खतरनाक साबित हो सकता है।
हालांकि, इन आलोचनाओं के जवाब में WHO और भारत सरकार दोनों का स्पष्ट रुख है कि पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं बल्कि पूरक माना जाना चाहिए। एकीकृत चिकित्सा (Integrative Medicine) का दृष्टिकोण, जहां आधुनिक और पारंपरिक चिकित्सा दोनों का उपयोग रोगी के सर्वोत्तम हित में किया जाता है, वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो रहा है। कई प्रतिष्ठित अस्पतालों और चिकित्सा केंद्रों ने एकीकृत चिकित्सा विभाग स्थापित किए हैं जहां पारंपरिक और आधुनिक उपचार एक साथ प्रदान किए जाते हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती गुणवत्ता नियंत्रण और मानकीकरण की है। आयुर्वेदिक और हर्बल उत्पादों की गुणवत्ता में बड़ा अंतर हो सकता है, जो कच्चे माल की उत्पत्ति, संग्रहण विधि, प्रसंस्करण तकनीक और निर्माण प्रक्रिया पर निर्भर करता है। कुछ अध्ययनों में आयुर्वेदिक उत्पादों में भारी धातुओं जैसे सीसा, पारा और आर्सेनिक की उपस्थिति पाई गई है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है। भारत सरकार ने इन चिंताओं को दूर करने के लिए आयुष उत्पादों के लिए सख्त गुणवत्ता मानक और परीक्षण प्रोटोकॉल विकसित किए हैं, लेकिन इनका कार्यान्वयन और निगरानी अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।
भविष्य की संभावनाएं और दीर्घकालिक प्रभाव
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा की कोडिंग शुरू करना भारतीय पारंपरिक चिकित्सा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जिसके दीर्घकालिक प्रभाव अगले दशकों में स्पष्ट होंगे। यदि यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी होती है और ICD-11 में पारंपरिक चिकित्सा का व्यापक समावेश हो जाता है, तो यह वैश्विक स्वास्थ्य परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।
इस मान्यता से भारत में पारंपरिक चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान को भी बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अधिक युवा इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित होंगे, और अंतरराष्ट्रीय छात्र भी भारत में आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन करने के लिए आकर्षित होंगे। वर्तमान में भारत में लगभग 500 से अधिक आयुष कॉलेज और संस्थान हैं जो स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं, और यह संख्या आने वाले वर्षों में बढ़ने की संभावना है।
फार्मास्युटिकल उद्योग में भी इस मान्यता के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। बड़ी अंतरराष्ट्रीय दवा कंपनियां पहले से ही आयुर्वेदिक और हर्बल उत्पादों में निवेश कर रही हैं, और WHO की मान्यता इस प्रवृत्ति को और तेज कर सकती है। नई औषधियों की खोज (drug discovery) में भी पारंपरिक चिकित्सा का ज्ञान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, क्योंकि कई आधुनिक दवाएं पारंपरिक रूप से उपयोग किए जाने वाले पौधों से विकसित की गई हैं।
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विशेषज्ञों की राय और सिफारिशें
अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के पूर्व निदेशक और प्रसिद्ध आयुर्वेद विशेषज्ञ प्रो. तनुजा नेसारी का कहना है, "WHO द्वारा आयुर्वेद की मान्यता हमारे लिए गर्व का विषय है, लेकिन इसके साथ ही यह एक बड़ी जिम्मेदारी भी लाती है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम उच्चतम गुणवत्ता मानकों को बनाए रखें, कठोर वैज्ञानिक शोध करें और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में प्रभावी ढंग से संप्रेषित करें। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि व्यावसायीकरण की होड़ में पारंपरिक चिकित्सा के मूल सिद्धांत और नैतिक मूल्य न खो जाएं।"
WHO के पारंपरिक चिकित्सा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, जिन्होंने गोपनीयता की शर्त पर बात की, "ICD-11 में पारंपरिक चिकित्सा का समावेश एक ऐतिहासिक कदम है, लेकिन यह केवल शुरुआत है। आगे का रास्ता लंबा और चुनौतीपूर्ण है। हमें व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है ताकि विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे में प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जा सके। भारत इस प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा रहा है और हम उनके सहयोग की सराहना करते हैं।"
निष्कर्ष
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा की वैश्विक कोडिंग शुरू करना भारतीय पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है जो दशकों के निरंतर प्रयास और वैज्ञानिक शोध का परिणाम है। यह कदम न केवल इन प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाएगा बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में इनकी भूमिका को भी मजबूत करेगा। हालांकि, इस मान्यता के साथ कई चुनौतियां और जिम्मेदारियां भी आती हैं, जिनमें गुणवत्ता नियंत्रण, वैज्ञानिक प्रमाणीकरण, और पारंपरिक ज्ञान की प्रामाणिकता बनाए रखना शामिल है।
आने वाले वर्षों में यह देखना रोचक होगा कि कैसे भारतीय पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक स्वास्थ्य परिदृश्य में अपना स्थान बनाती है और आधुनिक चिकित्सा के साथ एकीकृत होकर लाखों लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण में योगदान देती है। यह निश्चित रूप से भारत के लिए गर्व का क्षण है, और यह प्राचीन ज्ञान की आधुनिक प्रासंगिकता को प्रमाणित करता है। हालांकि, सफलता की कुंजी संतुलित दृष्टिकोण में निहित है जहां पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करते हुए आधुनिक वैज्ञानिक मानकों को भी अपनाया जाए, और जहां वाणिज्यिक हितों के साथ-साथ रोगियों के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
संदर्भ और स्रोत:
यह लेख विश्व स्वास्थ्य संगठन की आधिकारिक वेबसाइट, भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के आधिकारिक बयान, ICD-11 दस्तावेज, विभिन्न शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययन और पारंपरिक चिकित्सा विशेषज्ञों के साक्षात्कार पर आधारित है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि किसी भी चिकित्सा पद्धति को अपनाने से पहले योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
लेख में व्यक्त विचार और जानकारी शैक्षिक उद्देश्यों के लिए हैं और इन्हें चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

