भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट: क्यों 80% से ज़्यादा मरीज आज भी इलाज से दूर हैं?

भारत में 15 करोड़ से अधिक लोग मानसिक रोगों से जूझ रहे हैं, लेकिन 80% मरीज समय पर इलाज नहीं पा रहे। जानिए इसके पीछे के कारण, सरकारी नीतियाँ, आंकड़े और समाधान।

MEDICAL NEWS

ASHISH PRADHAN

1/5/20261 min read

An Indian patient reflecting the mental health crisis, where over 80% fail to receive timely treat
An Indian patient reflecting the mental health crisis, where over 80% fail to receive timely treat

भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट: 80 प्रतिशत से अधिक मरीज समय पर इलाज से वंचित

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के समक्ष उपस्थित गंभीर चुनौती और समाधान की दिशा में उठाए जाने वाले कदम

भारत में मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक गंभीर और चिंताजनक स्थिति उत्पन्न हो गई है, जहां 80 प्रतिशत से अधिक मानसिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को समय पर उचित चिकित्सकीय देखभाल और उपचार नहीं मिल पा रहा है, जो न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी देश के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।

यह आंकड़ा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टों में सामने आया है, जिसमें स्पष्ट रूप से यह दर्शाया गया है कि भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और पहुंच के मामले में गंभीर कमी है।

देश की विशाल जनसंख्या के अनुपात में मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं की संख्या अत्यंत सीमित है, और ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह स्थिति और भी भयावह है, जहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं लगभग नगण्य हैं। इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति समाज में व्याप्त कलंक, जागरूकता की कमी, आर्थिक बाधाएं और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में मानसिक स्वास्थ्य को पर्याप्त महत्व न दिया जाना जैसे कई कारक इस समस्या को और गंभीर बनाते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य संकट की वास्तविक तस्वीर: आंकड़ों के आईने में

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में लगभग 15 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित हैं, जिनमें अवसाद, चिंता विकार, द्विध्रुवी विकार, सिज़ोफ्रेनिया और अन्य गंभीर मानसिक रोग शामिल हैं। इन विशाल संख्या में मरीजों में से केवल 20 प्रतिशत से भी कम लोग ही समय पर उचित चिकित्सकीय परामर्श और उपचार प्राप्त कर पाते हैं, जबकि शेष 80 प्रतिशत से अधिक मरीज या तो अपनी समस्या को पहचान नहीं पाते, या फिर सामाजिक कलंक और आर्थिक कारणों से इलाज नहीं ले पाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर केवल 0.3 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जो विकसित देशों की तुलना में अत्यंत कम है और यह स्थिति मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में एक बड़ी बाधा बनती है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निम्हांस) के शोध में यह पाया गया है कि ग्रामीण भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच शहरी क्षेत्रों की तुलना में 70 प्रतिशत कम है, जहां लोगों को बुनियादी मानसिक स्वास्थ्य परामर्श के लिए भी सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। इसके अतिरिक्त, देश के कुल स्वास्थ्य बजट का केवल 0.05 प्रतिशत से 1 प्रतिशत के बीच ही मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित किया जाता है, जो इस क्षेत्र में सरकारी प्राथमिकता की कमी को दर्शाता है। महामारी के बाद की स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में 30 से 40 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जिसमें विशेष रूप से युवा वर्ग, महिलाएं और आर्थिक रूप से कमजोर तबके सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।

इलाज में देरी के पीछे छिपे कारण: एक बहुआयामी समस्या

मानसिक स्वास्थ्य इलाज में देरी के पीछे कई जटिल और परस्पर संबंधित कारण हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है सामाजिक कलंक और मानसिक बीमारियों के प्रति समाज में व्याप्त गलत धारणाएं। भारतीय समाज में मानसिक रोगों को अक्सर अलौकिक शक्तियों, पिछले जन्म के पापों या परिवार की बदनामी से जोड़कर देखा जाता है, जिसके कारण मरीज और उनके परिवार चिकित्सकीय सहायता लेने के बजाय तांत्रिकों, ओझाओं या धार्मिक उपचारों की ओर रुख करते हैं। इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 65 प्रतिशत मानसिक रोगियों के परिवार पहले पारंपरिक उपचारों को आजमाते हैं और केवल स्थिति गंभीर होने पर ही चिकित्सकीय सहायता लेते हैं, जब तक रोग काफी बढ़ चुका होता है।

मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की भारी कमी भी एक प्रमुख बाधा है, जहां देश में केवल 9,000 से 10,000 प्रशिक्षित मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जो 140 करोड़ की जनसंख्या के लिए अत्यंत अपर्याप्त है। इसके साथ ही मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सा परामर्शदाताओं और मानसिक स्वास्थ्य सामाजिक कार्यकर्ताओं की संख्या भी बेहद सीमित है। आर्थिक बाधाएं भी एक महत्वपूर्ण कारक हैं, क्योंकि निजी मनोचिकित्सकों का परामर्श शुल्क सामान्य परिवारों की पहुंच से बाहर होता है और सरकारी अस्पतालों में लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण समय पर इलाज मिल पाना कठिन होता है। स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में मानसिक स्वास्थ्य उपचार को पर्याप्त कवरेज न मिलना भी एक बड़ी समस्या है, हालांकि मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 में इस दिशा में कुछ प्रावधान किए गए हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

जागरूकता और पहचान की समस्या: प्रारंभिक लक्षणों की अनदेखी

मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के प्रारंभिक लक्षणों को पहचानने में असमर्थता और जागरूकता की कमी भी इलाज में देरी का एक प्रमुख कारण है। अवसाद, चिंता विकार और अन्य मानसिक रोगों के शुरुआती लक्षण जैसे कि लगातार उदासी, रुचि में कमी, नींद और भूख में परिवर्तन, सामाजिक अलगाव और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई को अक्सर सामान्य तनाव या थकान समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

भारतीय मनोचिकित्सा सोसायटी के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 70 प्रतिशत लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बुनियादी लक्षणों से अनभिज्ञ हैं और इसे शारीरिक कमजोरी या व्यक्तित्व दोष मानते हैं।

विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां शिक्षा और स्वास्थ्य जागरूकता का स्तर कम है, वहां मानसिक रोगों को अभिशाप या दैवीय प्रकोप के रूप में देखा जाता है। युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की दर भी इस बात का संकेत है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को समय पर पहचाना और उनका उपचार नहीं किया जा रहा है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर घंटे एक छात्र आत्महत्या करता है, और इनमें से अधिकांश मामलों में अनुपचारित अवसाद, चिंता या अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं प्रमुख कारण होती हैं। कार्यस्थलों पर भी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और सहायता प्रणाली की कमी है, जहां कर्मचारी अपनी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को छिपाते हैं क्योंकि उन्हें नौकरी खोने या भेदभाव का डर रहता है।

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उपचार की चुनौतियां: दवाओं की उपलब्धता और वैकल्पिक चिकित्सा

मानसिक स्वास्थ्य के उपचार में दवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत में मनोचिकित्सकीय दवाओं की उपलब्धता, वितरण और सही उपयोग से जुड़ी कई चुनौतियां हैं। एंटीडिप्रेसेंट दवाएं जैसे कि सेलेक्टिव सेरोटोनिन रीअपटेक इनहिबिटर्स (एसएसआरआई), सेरोटोनिन-नॉरएपिनेफ्रिन रीअपटेक इनहिबिटर्स (एसएनआरआई) और एटिपिकल एंटीसाइकोटिक्स मानसिक रोगों के उपचार में प्रभावी हैं, लेकिन ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में इन दवाओं की पहुंच सीमित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल कई मनोचिकित्सकीय दवाएं भारत के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हैं।

मनोचिकित्सा और संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी जैसे गैर-औषधीय उपचार विधियां भी मानसिक स्वास्थ्य के उपचार में अत्यंत प्रभावी हैं, लेकिन प्रशिक्षित मनोचिकित्सा विशेषज्ञों की कमी के कारण इन सेवाओं की उपलब्धता बहुत सीमित है। हाल के वर्षों में डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म और टेलीमेडिसिन सेवाओं का विकास हुआ है, जो कुछ हद तक पहुंच की समस्या को कम कर रहे हैं, लेकिन डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी इन सेवाओं के व्यापक उपयोग में बाधा बनती है। सरकार द्वारा चलाई जा रही किरण हेल्पलाइन और टेली-मानस जैसी पहलें सकारात्मक कदम हैं, लेकिन इनकी पहुंच और प्रभावशीलता को और बढ़ाने की आवश्यकता है।

सरकारी नीतियां और कार्यक्रम: क्या पर्याप्त हैं?

भारत सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण नीतिगत पहल की हैं, जिनमें मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 सबसे प्रमुख है, जो मानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा करता है और उन्हें गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिनियम आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से हटाता है और मानसिक रोगियों के साथ भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, जो एक ऐतिहासिक कदम था। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जिला स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है, और जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

हालांकि, इन नीतियों के क्रियान्वयन में कई चुनौतियां हैं, जिनमें बजट की कमी, प्रशिक्षित मानव संसाधन की अनुपलब्धता और राज्य सरकारों की प्राथमिकता में मानसिक स्वास्थ्य का निम्न स्थान शामिल है। आयुष्मान भारत योजना के तहत मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को शामिल करने का प्रावधान है, लेकिन इसका लाभ बहुत सीमित संख्या में लोगों तक पहुंच पाया है। मनोदर्पण पहल, जो विशेष रूप से छात्रों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित है, एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके व्यापक प्रचार-प्रसार और क्रियान्वयन की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने स्वास्थ्य बजट का कम से कम 5 से 10 प्रतिशत मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित करना चाहिए, जो वर्तमान में एक प्रतिशत से भी कम है।

विशेषज्ञों की राय: समाधान की दिशा में आवश्यक कदम

भारतीय मनोचिकित्सा सोसायटी के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. राजेश साहू का कहना है कि "मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें सामाजिक जागरूकता, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में वृद्धि और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की संख्या में तेजी से वृद्धि शामिल हो। हमें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बुनियादी मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और उपचार की सुविधा उपलब्ध करानी होगी और सामान्य चिकित्सकों को मानसिक स्वास्थ्य के बुनियादी पहलुओं में प्रशिक्षित करना होगा।" निम्हांस के डायरेक्टर डॉ. प्रतिमा मूर्ति ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि "मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान महत्व देना आवश्यक है और इसके लिए सामाजिक स्तर पर कलंक को दूर करना सबसे जरूरी है।"

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के मनोचिकित्सा विभाग के विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए, जिससे युवा पीढ़ी मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझ सके और आवश्यकता पड़ने पर सहायता ले सके। कार्यस्थलों पर एम्प्लॉई असिस्टेंस प्रोग्राम्स को अनिवार्य बनाना और नियमित मानसिक स्वास्थ्य जांच को प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है। टेलीमेडिसिन और डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देना, विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में, पहुंच की समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय तुलना: भारत कहां खड़ा है?

जब हम वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की स्थिति को देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि विकसित देशों की तुलना में भारत मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में काफी पीछे है। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रति एक लाख जनसंख्या पर लगभग 12 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जबकि भारत में यह संख्या केवल 0.3 है। यूरोपीय देशों में मानसिक स्वास्थ्य पर स्वास्थ्य बजट का 5 से 15 प्रतिशत खर्च किया जाता है, जबकि भारत में यह एक प्रतिशत से भी कम है। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त और सुलभ हैं, और वहां कम्युनिटी मेंटल हेल्थ टीम्स प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं।

हालांकि, श्रीलंका, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे विकासशील देशों ने भी अपनी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं और कम्युनिटी-बेस्ड मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानसिक स्वास्थ्य कार्य योजना 2013-2030 सभी देशों से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता देने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करने का आह्वान करता है। भारत को इन अंतर्राष्ट्रीय मानकों को अपनाने और अपनी मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के लिए ठोस प्रयास करने की आवश्यकता है।

Indian patients waiting at a community health center highlighting the mental health treatment gap
Indian patients waiting at a community health center highlighting the mental health treatment gap

कोविड-19 महामारी का प्रभाव: संकट का गहराना

कोविड-19 महामारी ने पहले से ही कमजोर मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव डाला है और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। लॉकडाउन के दौरान सामाजिक अलगाव, आर्थिक अनिश्चितता, नौकरी की हानि, प्रियजनों की मृत्यु और संक्रमण के भय ने अवसाद, चिंता विकार और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के मामलों में वृद्धि की है। इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी के एक अध्ययन के अनुसार, महामारी के दौरान मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन सेवाओं की उपलब्धता में कोई समानुपातिक वृद्धि नहीं हुई।

स्वास्थ्य कर्मियों, विशेष रूप से कोविड वार्डों में काम करने वाले डॉक्टरों और नर्सों में बर्नआउट और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस के मामले बड़ी संख्या में देखे गए। बच्चों और किशोरों में भी स्कूल बंद होने, ऑनलाइन शिक्षा के तनाव और सामाजिक संपर्क की कमी के कारण मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि हुई है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 15 से 24 वर्ष के लगभग 15 प्रतिशत युवा अवसाद या चिंता से पीड़ित हैं, जो महामारी के बाद बढ़ी है। महामारी ने यह भी उजागर किया कि भारत की मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली आपातकालीन स्थितियों में अतिरिक्त भार को संभालने के लिए तैयार नहीं है, और इस दिशा में तत्काल सुधार की आवश्यकता है।

समाधान की दिशा में: समुदाय-आधारित मॉडल और नवाचार

मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए समुदाय-आधारित मानसिक स्वास्थ्य मॉडल एक प्रभावी समाधान हो सकता है, जिसमें स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, आशा वर्करों और सामुदायिक स्वयंसेवकों को बुनियादी मानसिक स्वास्थ्य प्राथमिक चिकित्सा में प्रशिक्षित किया जाए। कई राज्यों में किए गए पायलट प्रोजेक्ट्स में यह देखा गया है कि प्रशिक्षित सामुदायिक कार्यकर्ता मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान करने, बुनियादी परामर्श देने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सेवाओं तक रेफर करने में सक्षम हैं। महाराष्ट्र और तमिलनाडु में चलाए गए डिस्ट्रिक्ट मेंटल हेल्थ प्रोग्राम्स इस दिशा में सकारात्मक परिणाम दिखा रहे हैं।

डिजिटल हस्तक्षेप और मोबाइल एप्लिकेशन भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। टॉकटू एंजेल, बीइंग, माइंड पीस और अन्य भारतीय स्टार्टअप्स ऑनलाइन काउंसलिंग और थेरेपी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, जो विशेष रूप से शहरी युवाओं में लोकप्रिय हो रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और चैटबॉट आधारित प्रारंभिक हस्तक्षेप भी प्रयोगात्मक चरण में हैं, जो 24x7 बुनियादी मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान कर सकते हैं। पीयर सपोर्ट ग्रुप्स और ऑनलाइन कम्युनिटीज भी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए एक सुरक्षित स्थान प्रदान करते हैं, जहां वे अपने अनुभव साझा कर सकते हैं और एक-दूसरे का समर्थन कर सकते हैं।

भविष्य की राह: एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता

भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट से प्रभावी रूप से निपटने के लिए एक बहुस्तरीय और समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें सरकारी नीतियां, स्वास्थ्य प्रणाली सुधार, सामाजिक जागरूकता और समुदाय की भागीदारी सभी शामिल हों। सबसे पहले, मानसिक स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में महत्वपूर्ण वृद्धि करना आवश्यक है, और इसे कम से कम कुल स्वास्थ्य बजट का 5 प्रतिशत बनाया जाना चाहिए। मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और मानसिक स्वास्थ्य परामर्शदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए मेडिकल कॉलेजों में मनोचिकित्सा विभागों का विस्तार करना और अधिक प्रशिक्षण सीटें उपलब्ध कराना आवश्यक है।

प्रत्येक जिले में कम से कम एक व्यापक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना करना, जहां आउट-पेशेंट और इन-पेशेंट दोनों सेवाएं उपलब्ध हों, एक महत्वपूर्ण कदम होगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सामान्य चिकित्सकों को मानसिक स्वास्थ्य के बुनियादी पहलुओं में प्रशिक्षित करना और आवश्यक मनोचिकित्सकीय दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है। स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाने चाहिए। मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना और कलंक को कम करने के लिए सेलिब्रिटीज और प्रभावशाली व्यक्तियों की सहायता लेना भी प्रभावी हो सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के प्रावधानों का सख्ती से क्रियान्वयन सुनिश्चित करना और मानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है। स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में मानसिक स्वास्थ्य उपचार को शारीरिक स्वास्थ्य के समान कवरेज देना और आयुष्मान भारत के तहत मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी रूप से शामिल करना जरूरी है। अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना, विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में प्रभावी और लागत-कुशल हस्तक्षेपों के विकास के लिए, दीर्घकालिक समाधान के लिए आवश्यक है। गैर-सरकारी संगठनों, निजी क्षेत्र और सिविल सोसाइटी की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करना और उनके साथ सार्थक साझेदारी विकसित करना मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता में सुधार ला सकता है।

निष्कर्ष

भारत में 80 प्रतिशत से अधिक मानसिक रोगियों को समय पर उचित इलाज न मिल पाना एक गंभीर राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट है, जो न केवल लाखों व्यक्तियों और उनके परिवारों के जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि देश की उत्पादकता और सामाजिक-आर्थिक विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। इस संकट से निपटने के लिए एक व्यापक, बहुआयामी और दीर्घकालीन रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें सरकारी प्रतिबद्धता, पर्याप्त संसाधन आवंटन, स्वास्थ्य प्रणाली सुधार, सामाजिक जागरूकता और कलंक में कमी सभी शामिल हों। मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान प्राथमिकता देना और इसे सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का अनिवार्य हिस्सा बनाना आवश्यक है।

प्रत्येक नागरिक, परिवार, समुदाय, कार्यस्थल और संस्थान को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील और सहयोगी वातावरण बनाने में योगदान देना होगा। यदि हम आज ठोस और समयबद्ध कदम नहीं उठाते हैं, तो यह समस्या और गंभीर होती जाएगी और आने वाली पीढ़ियों को इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा। मानसिक स्वास्थ्य केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि संपूर्ण कल्याण की स्थिति है, और प्रत्येक भारतीय नागरिक इसका हकदार है। यह समय की मांग है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाएं और एक स्वस्थ, खुशहाल और अधिक उत्पादक भारत के निर्माण के लिए सामूहिक प्रयास करें।

संदर्भ और स्रोत:

  1. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण, भारत सरकार, 2015-16

  2. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट, 2022

  3. इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री, विभिन्न शोध पत्र

  4. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निम्हांस), बेंगलुरु

  5. मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017

  6. इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी के प्रकाशन और सर्वेक्षण

  7. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो, भारत सरकार

  8. यूनिसेफ रिपोर्ट - भारत में बच्चों और युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य

नोट: यह लेख केवल सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी मानसिक स्वास्थ्य समस्या के लिए कृपया योग्य मनोचिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।

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