DCGI का सख्त फैसला: आर्टेमिसिनिन सिंगल-ड्रग टैबलेट्स पर 2009 का बैन फिर लागू, मलेरिया दवा-प्रतिरोध रोकने की बड़ी कोशिश
मलेरिया दवा-प्रतिरोध के खतरे के बीच DCGI ने आर्टेमिसिनिन मोनोथेरेपी पर 2009 के प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया। जानिए कारण, असर और WHO की भूमिका।
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“DCGI का सख्त कदम: आर्टेमिसिनिन सिंगल-ड्रग टैबलेट्स पर 2009 के प्रतिबंध को लागू करने की नई पहल, मलेरिया दवा-प्रतिरोध की बढ़ती चिंता के बीच निर्णायक हस्तक्षेप”
परिचय
भारत में मलेरिया नियंत्रण और उन्मूलन की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के बीच, Drugs Controller General of India (DCGI) का हालिया कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिहाज़ से बेहद अहम माना जा रहा है। केंद्रीय औषधि नियामक प्राधिकरणों ने वर्ष 2009 में आर्टेमिसिनिन आधारित सिंगल-ड्रग (मोनोथेरेपी) टैबलेट्स पर लगाए गए प्रतिबंध को दोबारा सख्ती से लागू करने के निर्देश जारी किए हैं।
इस निर्णय के तहत देशभर में प्रतिबंधित दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर कड़ा नियंत्रण सुनिश्चित किया जाएगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब मलेरिया परजीवी में आर्टेमिसिनिन के प्रति दवा-प्रतिरोध के संकेत सामने आ रहे हैं, जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना जा रहा है। DCGI ने सभी राज्य औषधि नियंत्रकों को निगरानी बढ़ाने, नियमित निरीक्षण करने और नियमों के उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
यह पहल केवल नियामक अनुपालन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सिफारिशों और भारत के दीर्घकालिक सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों से जुड़ा हुआ है।
पृष्ठभूमि: मलेरिया, भारत और आर्टेमिसिनिन की भूमिका
भारत मलेरिया प्रभावित देशों में लंबे समय तक शामिल रहा है। बीते दो दशकों में सरकारी कार्यक्रमों, बेहतर निदान, प्रभावी दवाओं और वेक्टर नियंत्रण उपायों के कारण मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। इस सफलता में आर्टेमिसिनिन आधारित दवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
आर्टेमिसिनिन, जो मूल रूप से Artemisia annua पौधे से प्राप्त होती है, मलेरिया परजीवी पर तेज़ी से असर करने वाली दवा मानी जाती है। इसके आने से पहले मलेरिया उपचार में उपयोग होने वाली कई दवाओं के प्रति परजीवी प्रतिरोधी हो चुका था। आर्टेमिसिनिन ने गंभीर और जटिल मलेरिया के उपचार में नई उम्मीद दी, लेकिन समय के साथ यह भी स्पष्ट हुआ कि यदि इसे अकेले (single-drug) रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो यही दवा भविष्य में अप्रभावी हो सकती है।
2009 का प्रतिबंध: तब क्या निर्णय लिया गया था?
वर्ष 2009 में, WHO और भारत सरकार के तकनीकी विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया कि आर्टेमिसिनिन मोनोथेरेपी मलेरिया नियंत्रण के लिए खतरनाक हो सकती है। इसके बाद भारत में सिंगल-ड्रग आर्टेमिसिनिन टैबलेट्स और कैप्सूल्स पर प्रतिबंध लगाया गया।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि मरीजों को केवल Artemisinin-Based Combination Therapy (ACT) ही दी जाए, जिसमें आर्टेमिसिनिन को किसी दूसरी लंबे समय तक असर करने वाली एंटीमलेरियल दवा के साथ मिलाकर दिया जाता है। यह नीति वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित थी और वैश्विक स्तर पर स्वीकार की गई थी।
फिर सख्ती की ज़रूरत क्यों पड़ी?
हाल ही के वर्षों में यह सामने आया कि कुछ स्थानों पर बैन के बावजूद सिंगल-ड्रग आर्टेमिसिनिन दवाएँ बाजार में उपलब्ध हैं। ये दवाएँ अक्सर अनियमित चैनलों, छोटे निर्माताओं या अनधिकृत आपूर्ति शृंखलाओं के माध्यम से पहुंच रही थीं।
DCGI के अनुसार, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि इससे आर्टेमिसिनिन प्रतिरोध (Artemisinin Resistance) के विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। एक बार प्रतिरोध फैल गया, तो न केवल भारत बल्कि पड़ोसी देशों में भी मलेरिया नियंत्रण प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं। इसी पृष्ठभूमि में 2009 के प्रतिबंध को फिर से सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया गया।
आर्टेमिसिनिन प्रतिरोध क्या है और यह कैसे विकसित होता है?
दवा-प्रतिरोध तब विकसित होता है जब परजीवी दवा के संपर्क में आकर पूरी तरह नष्ट नहीं होता। सिंगल-ड्रग थेरेपी में अक्सर ऐसा होता है कि दवा परजीवी की संख्या तो घटा देती है, लेकिन सभी परजीवी मरते नहीं हैं।
जो परजीवी बच जाते हैं, वे धीरे-धीरे दवा के प्रति सहनशील (tolerant) और फिर प्रतिरोधी (resistant) बन जाते हैं। यही कारण है कि WHO ने स्पष्ट रूप से कहा है कि आर्टेमिसिनिन को कभी भी अकेले इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
ACT: संयोजन थेरेपी क्यों है सुरक्षित और प्रभावी?
ACT की संरचना और कार्य-प्रणाली
Artemisinin-Based Combination Therapy में दो अलग-अलग वर्ग की दवाएँ होती हैं।
आर्टेमिसिनिन या उसका व्युत्पन्न परजीवी को तेजी से मारता है।
दूसरी दवा (जैसे ल्यूमेफैन्ट्रिन, पाइपेराक्विन या सल्फाडॉक्सिन-पाइरीमेथामाइन) लंबे समय तक रक्त में बनी रहती है और बचे हुए परजीवियों को खत्म करती है।
इसके फायदे
दवा-प्रतिरोध विकसित होने की संभावना बेहद कम हो जाती है।
उपचार की सफलता दर अधिक होती है।
WHO और भारत सरकार दोनों ने इसे गोल्ड स्टैंडर्ड उपचार माना है।
DCGI का नया निर्देश: क्या-क्या शामिल है?
DCGI द्वारा जारी निर्देशों में साफ कहा गया है कि:
राज्य औषधि नियंत्रक अपने-अपने क्षेत्रों में बैन की गई आर्टेमिसिनिन मोनोथेरेपी दवाओं की पहचान करें।
ऐसी दवाओं की बिक्री, वितरण और निर्माण पर तत्काल रोक लगाई जाए।
नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जाए।
यह निर्देश केवल कागज़ी नहीं हैं, बल्कि इन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू करने की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से तय की गई है।
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मलेरिया का निदान: सही समय पर सही जांच क्यों ज़रूरी है?
निदान के प्रमुख तरीके
मलेरिया का निदान आमतौर पर निम्न तरीकों से किया जाता है:
माइक्रोस्कोपी द्वारा रक्त की जांच
Rapid Diagnostic Tests (RDTs)
संदिग्ध मामलों में दोबारा पुष्टि
लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें
तेज़ बुखार, ठंड लगना, सिर दर्द, उल्टी, कमजोरी और पसीना—ये सभी मलेरिया के सामान्य लक्षण हैं। सही निदान के बिना दवा लेना न केवल खतरनाक है, बल्कि दवा-प्रतिरोध को भी बढ़ावा दे सकता है।
सावधानियाँ: मरीज और आम जनता के लिए सलाह
बिना जांच के एंटीमलेरियल दवा न लें।
केवल डॉक्टर द्वारा निर्धारित ACT का ही पूरा कोर्स करें।
अधूरा इलाज न छोड़ें, भले ही लक्षण जल्दी ठीक हो जाएँ।
बैन की गई सिंगल-ड्रग दवाओं से पूरी तरह बचें।
विशेषज्ञों की राय और सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि DCGI का यह कदम भविष्य की बड़ी स्वास्थ्य चुनौती को समय रहते रोकने का प्रयास है। यदि आर्टेमिसिनिन प्रतिरोध व्यापक रूप से फैल गया, तो नई दवाओं के विकास में वर्षों लग सकते हैं और लाखों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है।
चिकित्सकों के अनुसार, संयोजन थेरेपी का पालन और नियामक सख्ती ही मलेरिया उन्मूलन की दिशा में सबसे मजबूत हथियार है।
भारत का मलेरिया उन्मूलन लक्ष्य और यह निर्णय
भारत ने 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए:
प्रभावी दवाओं की उपलब्धता
सही निदान
दवा-प्रतिरोध की रोकथाम
तीनों अनिवार्य हैं। DCGI का यह कदम इन तीनों स्तंभों को मजबूत करता है।
निष्कर्ष
आर्टेमिसिनिन सिंगल-ड्रग टैबलेट्स पर 2009 के प्रतिबंध को दोबारा सख्ती से लागू करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा कदम है। यह संदेश साफ है कि मलेरिया जैसे गंभीर रोग में शॉर्ट-कट या लापरवाही की कोई जगह नहीं है।
विशेषज्ञों की सलाह, WHO की सिफारिशें और DCGI की सख्ती—इन तीनों के समन्वय से ही भारत मलेरिया उन्मूलन के लक्ष्य की ओर सुरक्षित और टिकाऊ तरीके से आगे बढ़ सकता है।
संदर्भ (References):
Drugs Controller General of India (DCGI) notifications and regulatory communications
World Health Organization (WHO): Artemisinin resistance and ACT guidelines
National Drug Policy for Malaria, Government of India
National Center for Vector Borne Diseases Control (NCVBDC)