महँगी ब्रांडेड दवाएँ बनाम सस्ती जेनेरिक दवाएँ: असर और गुणवत्ता पर जानिए क्या कहता है नया अध्ययन
एक हालिया भारतीय अध्ययन से खुलासा हुआ है कि ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता व प्रभावकारिता लगभग समान है, जबकि कीमत में 14 गुना तक का अंतर हो सकता है। जानिए विज्ञान क्या कहता है, डॉक्टरों की राय क्या है और इससे मरीजों की जेब व स्वास्थ्य प्रणाली पर क्या असर पड़ेगा।
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सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ब्रांडेड और जेनेरिक दवाएँ वास्तव में क्या होती हैं।
ब्रांडेड दवाएँ
ब्रांडेड दवाएँ वे होती हैं जो किसी फार्मास्युटिकल कंपनी द्वारा पेटेंट, अनुसंधान और मार्केटिंग के साथ लॉन्च की जाती हैं। इनका नाम, पैकेजिंग और प्रचार सभी कंपनियों की ब्रांडिंग रणनीति के अंतर्गत आते हैं।
जेनेरिक दवाएँ
जब किसी ब्रांडेड दवा का पेटेंट समाप्त हो जाता है, तो अन्य कंपनियाँ उसी सक्रिय तत्व (Active Ingredient) को उपयोग में लेकर समान विशेषताओं वाली दवा बना सकती हैं, जिसे जेनेरिक कहा जाता है। जेनेरिक दवाओं का सक्रिय तत्व, खुराक, रूप और उपयोग का तरीका मूल दवा जैसा ही होता है, जिससे चिकित्सीय प्रभाव और सुरक्षा मानक समान माना जाता है।
इन दोनों के बीच मुख्य अंतर केवल नाम, पैकेजिंग और कीमत का है, न कि दवा के प्रभाव या गुणवत्ता का।
क्या जेनेरिक दवाएँ वास्तव में ब्रांडेड वाली जितनी प्रभावी हैं?
वैज्ञानिक शोध और चिकित्सा साक्ष्य के अनुसार, कई अध्ययन यह दर्शाते हैं कि जेनेरिक दवाएँ अक्सर ब्रांडेड दवाओं की तुलना में समान स्तर की चिकित्सा प्रभावकारिता प्रदान करती हैं।
वैज्ञानिक शोध का संकेत
एक बड़ा अध्ययन जिसमें 3.5 मिलियन से अधिक रोगियों के डेटा का विश्लेषण किया गया, यह पाया गया कि जेनेरिक दवाओं का उपयोग ब्रांडेड दवाओं के समान नैदानिक परिणाम देता है, और यह मधुमेह, उच्च रक्तचाप, ऑस्टियोपोरोसिस, अवसाद जैसी बीमारियों में देखा गया।
एक अन्य चिकित्सीय अध्ययन में आबादी आधारित सर्वेक्षण में न तो प्रभावकारिता में और न ही दुष्प्रभाव में किसी महत्वपूर्ण अंतर को पाया गया।
विश्व स्वास्थ्य प्रणाली का मानना है कि यदि जेनेरिक दवा ब्रांडेड की तरह ही जैव-समानता (bioequivalence) रखती है तो इसका असर भी मरीजों पर समान होना चाहिए।
इन डेटा से यह स्पष्ट होता है कि विज्ञान के आधार पर अधिकांश दवाओं के मामले में ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के बीच कोई चिकित्सकीय अंतर नहीं होता है।
क्या सभी शोध एक समान परिणाम दिखाते हैं?
जहाँ अधिकांश अनुसंधानों ने समानता का संकेत दिया है, वहीं कुछ मामलों में प्रभावों या परिणामों पर थोड़ा भिन्नता भी देखी गई है। उदाहरण के लिए, कुछ मानसिक स्वास्थ्य दवाओं पर किये गए अध्ययनों में पाया गया कि कुछ ब्रांडेड दवाएँ अल्प अवधि में बेहतर परिणाम दे सकती हैं। हालांकि यह परिणाम सभी दवाओं पर सामान्य नहीं किया जा सकता। इस प्रकार की विशिष्ट चिकित्सा शर्तों पर अलग-अलग शोध और अध्ययन जारी हैं।
क्यों जेनेरिक दवाएँ सस्ती होती हैं?
ब्रांडेड दवाओं की महँगाई का मुख्य कारण है धेर सारा अनुसंधान और विकास (R&D), पेटेंट शुल्क, मार्केटिंग और वितरण खर्च जो कंपनी को सहना पड़ता है। दूसरी ओर, जेनेरिक निर्माता पहले से मान्य फार्मूले और शोध के आधार पर दवा बनाते हैं, जिसके कारण लागत में भारी कमी आती है।
डाटा कहता है कि जेनेरिक दवाएँ ब्रांडेड की तुलना में 30% से 90% तक सस्ती हो सकती हैं, लेकिन गुणवत्ता और सक्रिय तत्व समान रहते हैं।
डॉ. एक्सपर्ट्स और विशेषज्ञ राय
जब हम डॉक्टर्स या फार्मा विशेषज्ञों से बात करते हैं, तो उनकी राय भी इस दिशा में है कि अधिकांश स्थितियों में जेनेरिक दवाएँ सुरक्षित और प्रभावी विकल्प हैं।
डॉ. जीवन कसारा, एक अनुभवी फार्मास्युटिकल निदेशक ने कहा है कि जेनेरिक दवाओं के डोज़, सख्ती, और प्रभावशीलता मानक औद्योगिक रेगुलेटरी संस्थाओं द्वारा तय किये जाते हैं, जिससे दोनों तरह की दवाओं में गुणवत्ता समान रहती है।
हालाँकि कुछ विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि कुछ स्वास्थ्य स्थितियों में मरीज की प्रतिक्रिया भिन्न हो सकती है, पर सामान्य तौर पर अधिकांश बीमारी के इलाज में इनका असर तुलनीय होता है।
क्लिनिकल ट्रायल और जैव-समानता (Bioequivalence)
हर जेनेरिक दवा को बाज़ार में लॉन्च करने से पहले उसकी जैव-समानता परीक्षण (Bioequivalence) पास करना होता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह ब्रांडेड दवा जैसा ही रक्त में सक्रिय तत्व का स्तर पहुँचाती है। यह सुनिश्चित करता है कि दवा प्रभावकारक और सुरक्षित हो।
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मरीजों का अनुभव और धारणाएँ
सभी वैज्ञानिक तथ्यों के बावजूद, कुछ मरीजों के मन में यह धारणा होती है कि सस्ती दवाओं का असर कम होता है। और शोध के अनुसार भी लगभग 30 से 35% रोगी और डॉक्टर यह मानते हैं कि जेनेरिक दवाएँ कम प्रभावी होती हैं, जो कि एक मिथक है और इसे बदलने की आवश्यकता है।
भारत में जेनेरिक दवाओं का परिदृश्य
भारत दुनिया की सबसे बड़ी जेनेरिक दवा निर्माताओं में से एक है और यहाँ की जेनेरिक दवाओं को FDA, CDSCO और WHO मानकों के अनुरूप जांचा जाता है। भारतीय कंपनियाँ निर्यात के लिए उच्च गुणवत्ता मानकों को पूरा करती हैं और वैश्विक स्तर पर भी इनकी मांग बढ़ रही है।
सरकार की जन औषधि योजना और अन्य पहलें आम जनता को सस्ते, सुरक्षित और प्रभावी दवा विकल्प उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से हैं।
ख़तरा और दुष्प्रभाव
चाहे दवा ब्रांडेड हो या जेनेरिक, सक्रिय तत्व पर आधारित दुष्प्रभाव समान हो सकते हैं। दुष्प्रभाव उस सक्रिय तत्व की प्रतिक्रिया पर निर्भर करते हैं, न कि दवा के नाम पर। इसलिए दवा लेते समय कोई भी असामान्य लक्षण दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
निष्कर्ष और भविष्य की दिशा
आज का शोध इस बात का समर्थन करता है कि जेनेरिक दवाएँ अक्सर ब्रांडेड की तरह ही प्रभावी और सुरक्षित होती हैं, लेकिन लागत कहीं अधिक कम होती है। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर आर्थिक बोझ कम होता है और मरीजों के लिए इलाज अधिक सुलभ बनता है।
भारत जैसे देशों में जहाँ दवा की उपलब्धता और किफ़ायती इलाज का मुद्दा गंभीर है, वहाँ यह अध्ययन स्वास्थ्य नीति निर्माताओं, डॉक्टरों और आम जनता के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है।
हालाँकि, कुछ विशिष्ट चिकित्सा क्षेत्रों में और अनुसंधान की आवश्यकता है, पर व्यापक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि सही गुणवत्ता नियंत्रण के साथ जेनेरिक दवाएँ ब्रांडेड दवाओं का भरोसेमंद विकल्प हैं।
संदर्भ:
Quality of generic drugs as good as that of costlier branded cousins: Study, Times of India, 5 Jan 2026.
Comparative effectiveness of generic and brand-name drugs, PMC study.
Generic vs branded medicines: patient outcomes and perceptions, PMC observational study.
Generic and brand name drugs bioequivalence overview, Health Canada.
भारत में जेनेरिक दवाओं का परिदृश्य और सुरक्षा मानक, GNTTV report.
Generic drugs quality and myth vs reality, Harvard Health Review.
परिचय:
नई दिल्ली से प्रकाशित 5 जनवरी 2026 के एक हालिया अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि महँगी ब्रांडेड दवाओं और कम कीमत वाली जेनेरिक दवाओं के बीच गुणवत्ता और प्रभावकारिता में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया। इस अध्ययन के अनुसार, कुछ दवाओं की ब्रांडेड कीमत जेनेरिक की तुलना में 14 गुना तक अधिक होती है, जबकि चिकित्सा परिणाम और गुणवत्ता समान पाई गई। यह शोध, जो आम नागरिकों द्वारा वित्त पोषित किया गया था, भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली और मरीजों के खर्चों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
आज के समय में जब दवा की लागत बढ़ती जा रही है और आम आदमी की जेब पर दबाव बढ़ रहा है, यह सवाल कि क्या महँगी ब्रांडेड दवाएँ वास्तव में बेहतर हैं या नहीं, एक व्यापक बहस का विषय बन गया है। इस लेख में हम विस्तार से बताएँगे कि विज्ञान और शोध क्या कहता है; जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं के बीच असल अंतर क्या है; विशेषज्ञों, डॉक्टर्स और शोधकर्ताओं की क्या राय है; और आखिरकार इसका मरीजों और स्वास्थ्य प्रणाली पर क्या प्रभाव पड़ेगा।