फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन सर्वे में खुलासा — 73.9% मेडिकल छात्रों पर अत्यधिक लिपिकीय कार्यभार का बोझ

FAIMA-RMS सर्वे के अनुसार 73.9% मेडिकल छात्र अत्यधिक लिपिकीय कार्यों में उलझे हैं, जिससे क्लिनिकल ट्रेनिंग और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है।

LATEST NEWS

ASHISH PRADHAN

11/7/20251 min read

FAIMA survey reveals 74 percent Indian medical students burdened with clerical paperwork affecting
FAIMA survey reveals 74 percent Indian medical students burdened with clerical paperwork affecting

भारत के मेडिकल शिक्षा जगत में हाल ही में एक चिंताजनक तथ्य सामने आया है। फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन - रिव्यू मेडिकल सिस्टम (FAIMA-RMS) द्वारा किए गए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में पाया गया कि देश के लगभग 73.9 प्रतिशत मेडिकल छात्र अत्यधिक लिपिकीय (clerical) कार्यभार से जूझ रहे हैं। यह निष्कर्ष न केवल छात्रों की पढ़ाई की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता पर भी गंभीर असर डाल सकता है।

मेडिकल शिक्षा बन रही है ‘पेपरवर्क’ का बोझ

सर्वे में शामिल अधिकांश छात्रों ने बताया कि उन्हें अस्पतालों और कॉलेजों में रोगी रिपोर्टिंग, रिकॉर्ड मेंटेनेंस, और प्रशासनिक कागज़ी कार्यों में इतना समय देना पड़ता है कि वास्तविक क्लिनिकल लर्निंग और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के लिए बहुत कम समय बचता है। एक छात्र के शब्दों में — “हम डॉक्टर बनने आए थे, लेकिन दिनभर फाइलें भरने वाले क्लर्क बनकर रह गए हैं।”

इस प्रकार का बढ़ता लिपिकीय बोझ छात्रों की पढ़ाई के साथ-साथ उनके आत्मविश्वास को भी प्रभावित कर रहा है। मेडिकल क्षेत्र, जो सटीकता और एकाग्रता की मांग करता है, अब नौकरशाही और पेपरवर्क के जाल में उलझता जा रहा है।

क्‍या समाधान हो सकते है

FAIMA-RMS ने इस रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार और मेडिकल काउंसिल को सुझाव दिया है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं को डिजिटलाइजेशन, सहायक कर्मियों की नियुक्ति, और AI आधारित रिकॉर्ड मैनेजमेंट से सरल बनाया जाए। इससे मेडिकल छात्रों को मुख्य शैक्षणिक और क्लिनिकल कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।

क्‍या व्यापक असर पड़ सकता है

अगर यह समस्या समय रहते हल नहीं की गई, तो इसका सीधा असर देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर पड़ेगा। डॉक्टरों की नई पीढ़ी को यदि सही प्रशिक्षण और मानसिक राहत नहीं मिलेगी, तो भविष्य की चिकित्सा सेवाएँ भी गुणवत्ता में पिछड़ जाएँगी।


FAIMA ने सरकार से यह भी आग्रह किया है कि मेडिकल छात्रों के लिए कार्य-जीवन संतुलन (work-life balance) पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ ताकि वे इस दबाव से उबर सकें।

निष्कर्ष

FAIMA-RMS का यह सर्वे देश के चिकित्सा क्षेत्र के लिए एक चेतावनी की घंटी है। यह दिखाता है कि डॉक्टर बनने का सपना अब सिर्फ ज्ञान की परीक्षा नहीं, बल्कि मानसिक और प्रशासनिक संघर्ष का मैदान बन गया है। आवश्यकता इस बात की है कि मेडिकल शिक्षा में “मानवता” और “अध्ययन” का संतुलन बहाल किया जाए — ताकि भविष्य के डॉक्टर मरीजों के साथ-साथ स्वयं के स्वास्थ्य का भी ध्यान रख सकें।

स्रोत: FAIMA-RMS सर्वेक्षण रिपोर्ट, नवंबर 2025.

Disclaimer

यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।

Subscribe to our newsletter

Get the latest Health news in your box.

Recent Posts

Stay Connected Follow Us

Related Stories

More Stories

Trending Tips