G.B. Pant अस्पताल विवाद: डॉक्टर के इस्तीफे से मेडिकल ट्रेनिंग में वर्क-लाइफ बैलेंस पर बहस तेज़

G.B. Pant Hospital के DM कार्डियोलॉजी छात्र के इस्तीफे ने डॉक्टरों की थकान, ड्यूटी घंटे और मेडिकल शिक्षा के वर्क-लाइफ बैलेंस पर सवाल खड़े किए हैं।

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ASHISH PRADHAN

10/26/20251 min read

जी.बी. पंत अस्पताल में थके डॉक्टर की तस्वीर, लंबी ड्यूटी और वर्क-लाइफ बहस दिखाते हुए
जी.बी. पंत अस्पताल में थके डॉक्टर की तस्वीर, लंबी ड्यूटी और वर्क-लाइफ बहस दिखाते हुए

डाक्टर वर्क लाइफ बैलेंस G.B. Pant Hospital में प्रथम वर्ष के DM कार्डियोलॉजी छात्र का इस्तीफा

परिचय


नई दिल्ली: 23 अक्टूबर 2025 को, दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित अस्पताल G.B. Pant Hospital में एक प्रथम वर्ष के DM कार्डियोलॉजी (सुपर–विशेषज्ञता) छात्र ने अपना इस्तीफा दे दिया — यह निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस कड़ी परिश्रम, लगातार ड्यूटी और मानसिक व शारीरिक थकान की ऐसी तस्वीर खोलता है जिसे अक्सर चिकित्सा शिक्षा व प्रशिक्षण के पर्दे के पीछे छिपा माना जाता था। इस छात्र का नाम डा. अमित कुमार है, और उनकी पत्नी डॉ. ऋषु सिन्हा द्वारा लिखा गया पत्र अस्पताल प्रशासन व चिकित्सा संगठन में वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया कि “36 घंटे लगातार ड्यूटी, साप्ताहिक अवकाश का अभाव, नींद व विश्राम की कमी” जैसी परिस्थितियों के कारण उनके पति थकान व अवसाद की स्थिति में पहुँच गए।"


यह घटना कहाँ हुई है, कब हुई है, किसने इसे उजागर किया है, क्यों हुई है, और कैसे— सब कुछ एक साथ सामने आया है। दिल्ली के G.B. Pant Hospital में, एक प्रथम-वर्ष के DM कार्डियोलॉजी छात्र ने अपनी बड़ी मेहनत व महत्वाकांक्षा के बावजूद इस्तीफा देना पड़ा — कारण: लगता है, अनियंत्रित ड्यूटी-घंटे व ध्यान नहीं मिलना। इस माध्यम से न सिर्फ उस छात्र की स्थिति उजागर हुई, बल्कि सम्पूर्ण मेडिकल रेजिडेंसी प्रणाली में मौजूद चुप्पियों व व्यावहारिक चुनौतियों की चर्चा फिर से चर्चित हो गई। अब सवाल उठता है: ऐसी प्रणाली में क्या बदलाव संभव हैं, और क्या यह सिर्फ एक विदाई तक सीमित रहेगा या समग्र सुधार की दिशा में कदम बनेगा।

पृष्ठभूमि: जब प्रशिक्षण बन जाता है बोझ

चिकित्सा-शिक्षा और विशेष रूप से रेजिडेंसी/सुपर-विशेषज्ञता (DM/MCh) पाठ्यक्रमों में अनुभव मिलता है, लेकिन उसे अक्सर भारी-भरकम ड्यूटी, लंबे शिफ्ट, विराम-विहीन ड्यूटी और सामाजिक-जीवन की कुर्बानी के साथ जोड़ा जाता है। डा. अमित कुमार का मामला इस परिदृश्य को केंद्र में लाता है: उन्होंने MD (मेडिसिन) कर के NEET-SS में उच्च अंक प्राप्त किए, कार्डियोलॉजी में DM करना उनका सपना था — लेकिन प्रशिक्षण की शुरुआत में ही उन्होंने इस्तीफा दिया।


चिकित्सा शिक्षा की वास्तविकताओं में यह ­– अधिकांश रेजिडेंट डॉक्टरों द्वारा अनुभव की गई ‘थकावट’, ‘नींद की कमी’, ‘मानसिक दबाव’ व ‘सप्ताहिक छुट्टी का अभाव’ जैसी बातें शामिल हैं। वास्तव में, एक सर्वे के अनुसार देशभर में 1,031 रेजिडेंट्स ने उत्तर दिया कि 62 % से अधिक लोग “सप्ताह में 72 घंटे से अधिक काम” करते हैं और 86 % ने कहा कि अत्यधिक ड्यूटी उनके मानसिक स्वास्थ्य व रोगियों की देखभाल की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है।


1992 में जारी ‘सेंट्रल रेजिडेंसी स्कीम’ के निर्देशों में कहा गया था कि रेजिडेंट डॉक्टरों का लगातार सक्रिय ड्यूटी 12 घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए और उन्हें साप्ताहिक अवकाश मिलना चाहिए। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसे अनुपालन कराना चुनौतिपूर्ण रहा है — और G.B. Pant का यह हालिया मामला उसी असमंजस व दबाव को सामने ला रहा है।

क्या हुआ — मामला विस्तार से

उन्होंने — डॉ. अमित कुमार ने — 23 अक्टूबर 2025 को अपना इस्तीफा जमा किया, और उनकी पत्नी डॉ. ऋषु सिन्हा ने कार्डियोलॉजी विभाग को लिखा एक भावनात्मक पत्र जिसमें उन्होंने परिस्थिति की गंभीरता को रेखांकित किया:

“मेरा पति, डॉ. अमित कुमार, जो DM कार्डियोलॉजी कर रहे थे, नींद-विहीनता, थकान, शारीरिक व मानसिक उबाऊपन, अपमानजनक वातावरण का सामना कर रहे थे; 36 घंटे लगातार ड्यूटी और मानवीय अवकाश-नियतियों के अभाव के कारण उन्होंने 23.10.2025 को अपना इस्तीफा दिया।”


उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने दो RTI आवेदन अस्पताल में ड्यूटी-घंटों व नियम-पालन के बारे में पूछने हेतु दिए, लेकिन उत्तर नहीं मिला।
तदुपरांत, अस्पताल प्रशासन ने एक छः-सदस्यीय समिति गठित की है जो इस मामले तथा संपूर्ण रेजिडेंट ड्यूटी-घंटों की समीक्षा कर रही है।

इस प्रकार यह मामला व्यक्तिगत क्रिया से आगे बढ़कर संस्थागत समीक्षा व सुधार की दिशा में मोड़ लेता दिखाई दे रहा है — लेकिन उसके पहले हमें यह समझना होगा कि क्यों यह बड़ी बात है।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है?

  • मानव संसाधन का क्षरण: जब एक गतिशील, होनहार छात्र DM कार्डियोलॉजी की सीट छोड़ने पर मजबूर हो जाता है, तो यह संकेत है कि चिकित्सा-विशेषज्ञता प्रशिक्षुओं के लिए वातावरण अपेक्षित रूप से समर्थ नहीं है।

  • रोग-देखभाल पर असर: यदि प्रशिक्षुओं की थकावट, नींद-नुकसान या अवसाद जैसी स्थिति बनी रहती है, तो उनकी निर्णय-क्षमता, त्वरित प्रतिक्रिया, और रोग-प्रबंधन की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है — सीधे मरीजों का हित चिन्तित करता है।

  • नियम-पालन की विफलता: 1992 के निर्देशों के बावजूद वर्तमान समय में उनका अनुपालन न हो पाना बताता है कि सिर्फ नियम लिख देना पर्याप्त नहीं — उनका क्रियान्वयन, निगरानी व जवाबदेही भी जरूरी है।

  • मेडिकल शिक्षा की संरचना पर प्रश्नचिह्न: यह सवाल उठता है कि क्या सुपर-विशेषज्ञता पाठ्यक्रमों में सिर्फ तकनीकी क्षति पर ध्यान है, या प्रशिक्षुओं के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य, विश्राम, सामाजिक जीवन जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को भी समान रूप से देखा जाता है।

  • संस्थान व नीति-निर्माताओं के लिए अलार्म: अस्पतालों, विश्वविद्यालयों व स्वास्थ्य विभागों को इस तरह के संकेतों को गंभीरता से लेना होगा। विशेष रूप से जब राष्ट्रीय संगठन जैसे Delhi Medical Association (DMA) ने इस घटना को “मानव-असहाय ड्यूटी-घंटे” वाला मामला बताया है।

प्रश्न: ड्यूटी-घंटे कैसे हों गए इतने लंबें?

  • प्रशिक्षु डॉक्टरों पर बड़ी संख्या में मरीजों की जिम्मेदारियाँ आती हैं — ओपीडी, इमरजेंसी, वॉर्ड, ऑन-कॉल, रात-डे, और विशेष प्रक्रियाएँ।

  • संस्थागत प्रवाह (workflow) व मानव-शक्ति-तालिका (roster) अक्सर विराम-विहीन होती है क्योंकि कम स्टाफ में अधिक काम देना पड़ता है।

  • अवकाश या शिफ्ट-परिस्थितियों की कमी — वीकली ऑफ मिलने में देरी, लंबे इन‐हाउस टिकने की प्रवृत्ति — सहायक नहीं होती।

  • मानसिक व शारीरिक थकान के बावजूद कार्य-दबाव व प्रतिबद्धताओं के कारण प्रशिक्षुओं के पास निर्णय-छोड़ने की स्थिति बन जाती है — उदाहरणस्वरूप इस मामले में इस्तीफा।

  • ऐसे माहौल में “स्लिपेज” न होना आसान नहीं — उदाहरण के लिए इस मामले में 36 घंटे लगातार ड्यूटी की शिकायत है।

संस्थागत प्रतिक्रिया व आगे क्या हुआ?

कैसे बदलें प्रशिक्षु डॉक्टरों की ड्यूटी व प्रशिक्षण-परिस्थितियाँ?

  1. ड्यूटी-हॉर्स मॉनिटरिंग और पालन-निर्धारण — प्रत्येक प्रशिक्षण-संस्थान को 1992 के निर्देशों के अनुरूप (जैसे 12 घंटे से अधिक लगातार सक्रिय ड्यूटी नहीं, सप्ताह में कम-से-कम एक अवकाश) कार्यतालिका सुनिश्चित करनी होगी।

  2. मानसिक स्वास्थ्य व समर्थन प्रणाली — प्रशिक्षुओं के लिए नियमित काउन्सिलिंग, थकान-चिन्हों की पहचान, और समय-समय पर ‘कूल-डाऊन’ अवधि (rest-break) तय होना चाहिए।

  3. संतुलित कार्य-भार व टीम-वित्तीय संसाधन — पर्याप्त संख्या में जूनियर/सीनियर रेजिडेंट, फैकल्टी व परामर्शदाता पानी की तरह बनने चाहिए ताकि एक-दो व्यक्ति पर असामान्य बोझ न पड़े।

  4. पारदर्शिता व शिकायत-मैकेनिज्म — रेजिडेंट्स को यह भरोसा देना चाहिए कि यदि ड्यूटी-घंटे या कार्य-परिस्थितियाँ मानक से ऊपर हों, तो वे शिकायत दर्ज कर सकते हैं और तत्काल कार्रवाई होगी।

  5. सतत् समीक्षा व बाह्य ऑडिट — संस्था के बाहर से निरीक्षण/ऑडिट टीम समय-समय पर यह देखें कि प्रशिक्षण कार्यक्रम वास्तविक रूप से मानक-अनुरूप चल रहा है या नहीं।

  6. शिक्षण-परिस्थिति का मानसुक लाभकारी रूपांतरण — प्रशिक्षण सिर्फ तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि स्वास्थ्य-विकास, विश्राम, सामाजिक जीवन व संतुलन का अनुभव भी है; इस दृष्टिकोण से पाठ्यक्रमों को पुनर्गठित किया जाना चाहिए ।

विश्लेषण: किन-किन कारकों ने इसे इतना तीव्र किया?

  • प्रोफाइल व अपेक्षा का बहुत ऊँचा स्तर — DM कार्डियोलॉजी जैसी सीटें अत्यंत प्रतिस्पर्धी होती हैं; चयनित छात्र अक्सर निजी जीवन व विश्राम को न्योछावर कर देते हैं ताकि सफलता मिले। ऐसे में जब अपेक्षा-भूमिका (expectation-role) में असमानता आती है, तो फ्रस्ट्रेशन बढ़ जाता है।

  • संस्थान-कार्यप्रवाह व संसाधन-अभाव — सुपर-विशेषज्ञता विभागों में मरीजों की संख्या, आपातकालीन मामलों की प्रतिक्रिया-दर, शिफ्ट-उपलब्धता आदि अक्सर उच्च होती है, इसलिए प्रशिक्षुओं पर ड्यूटी-घंटों व विराम-अवकाश की योजनाएँ दबाव में पड़ जाती हैं।

  • नींद-व विश्राम की कमी + मानसिक स्वास्थ्य — लगातार ड्यूटी व पर्याप्त विश्राम का अभाव ‘बर्नआउट’ (burn-out), अवसाद व थकान-चक्र का कारण बन सकते हैं, जिससे प्रशिक्षु की शारीरिक-मानसिक क्षमता प्रभावित होती है।

  • नियम-पालन व जवाबदेही में अंतर — नियम तो हैं (जैसे 12 घंटे से अधिक सक्रिय ड्यूटी न हो आदि) लेकिन उनकी निगरानी व कार्यान्वयन अक्सर कमजोर होता है; उदाहरण–डॉ. सिन्हा द्वारा RTI आवेदन के बाद भी उत्तर नहीं मिलने का वर्णन। {CITATION_START}cite{CITATION_DELIMITER}turn0search0{CITATION_END}

  • सकारात्मक शिक्षा-प्रशिक्षण वातावरण की कमी — प्रशिक्षु जब सिर्फ ‘काम करने वाले’ मशीन के रूप में देखे जाते हैं, न कि सीखने-विकास की प्रक्रिया में, तो उनकी प्रेरणा व संतुष्टि पर असर पड़ता है।

क्या बदला जा सकता है? संस्थागत सुधार के सुझाव

  • शिफ्ट-रोस्टर में सुधार: उदाहरणस्वरूप, एक प्रशिक्षु को लगातार 24-36 घंटे की ड्यूटी देना बंद कर देना चाहिए — स्पष्ट विराम, पर्याप्त विश्राम व नींद सुनिश्चित हो।

  • मानसिक स्वास्थ्य-प्रोग्राम: अस्पताल में नियमित समय पर काउन्सिलर उपलब्ध हों, थकान-चिन्हों व अवसाद-लक्षणों के लिए जागरूकता सत्र हों, प्रशिक्षुओं को ‘स्व-देखभाल’ (self-care) की ट्रेनिंग दी जाए।

  • संख्या व संसाधनों का संतुलन: सुपर-स्पेशलिटी विभागों में प्रशिक्षुओं की संख्या, वरिष्ठ फैकल्टी व सपोर्ट स्टाफ का अनुपात इस प्रकार हो कि एक-दो व्यक्तियों पर अत्यधिक दबाव न बने।

  • निगरानी-मैकनिज्म: चिकित्सालय एवम् विश्वविद्यालय स्तर पर नियमित ऑडिट हों — ड्यूटी-घंटों, अवकाश-नियमों व प्रशिक्षण-प्रक्रिया का। रेजिडेंट्स को शिकायत-प्लेटफॉर्म व गुमनाम फीडबैक देने का अवसर मिलना चाहिए।

  • शिक्षण-संस्कृति में बदलाव: प्रशिक्षु को सिर्फ - ‘ड्यूटी करने वाला’ नहीं बल्कि - ‘शिक्षार्थी चिकित्सक’ के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें सीखना, गलती-सुधार, संतुलित जीवन और विश्राम शामिल हो।

  • नीति-परिवर्तन: राज्य और केंद्रीय स्वास्थ्य विभागों द्वारा रेजिडेंसी-शिफ्ट-नियमों का पुनरावलोकन और संघीय दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना चाहिए।

निष्कर्ष

अब सामने है यह रेखा: एक प्रशिक्षु डॉक्टर का इस्तीफा — लेकिन उसकी गूँज बहुत दूर तक जाती है। G.B. Pant Hospital में प्रथम वर्ष के DM कार्डियोलॉजी छात्र द्वारा दिया गया इस्तीफा एक चेतावनी-संकल्प है कि चिकित्सा-शिक्षण प्रणाली में सुधार की जरूरत है। यदि इस रूप में रही गयी तो आनेवाले समय में और प्रशिक्षुओं के लिए ऐसा निर्णय-स्थान बन सकता है कि उन्हें अपना अनुभव अधूरा छोड़ना पड़े — जो सेवा-क्षेत्र व रोग-देखभाल दोनों के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि प्रशिक्षु डॉक्टरों के ड्यूटी-घंटे, विश्राम-अवकाश, मानसिक स्वास्थ्य व सामाजिक-जीवन को प्रशिक्षु-प्रशिक्षित प्रणाली में मूलभूत भाग माना जाए। यदि हम इस दिशा में सक्रिय नहीं हुए, तो “सुपर-विशेषज्ञता चिकित्सा” का सपना-पथ बहुत सारे चिकित्सकों के लिए अधूरा रह जाएगा।


इस मामले से उत्प्रेरित होकर, स्वास्थ्य-प्रबंधन प्रणालियों, अस्पतालों व नीति-निर्माताओं को मिलकर इस प्रणाली को पुनर्स्थापित करना होगा — प्रशिक्षु-चिकित्सक-केंद्रित, मानव-मूल्यपरक, योग्य-विश्राम-समर्थित माहौल की दिशा में। यदि ऐसा हुआ, तो केवल एक डॉक्टर का सपना नहीं बचेगा, बल्कि समग्र स्वास्थ्य-सेवाओं की गुणवत्ता भी सुदृढ़ होगी।

स्रोत एवं उल्लेख
  • “GB Pant 1st year DM Cardiology resignation exposes harsh realities of endless duties”, Medical Dialogues, 25 October 2025.

  • “GB Pant hospital forms committee to probe inhumane duty hour allegations”, Medical Dialogues, 25 October 2025.

Disclaimer

यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।

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