MPFDA की सख्ती: मध्य प्रदेश की 30 दवा कंपनियों पर जांच — फार्मा इंडस्ट्री के लिए खतरे की घंटी या सुधार का अवसर?
मध्य प्रदेश की 30 फार्मा कंपनियाँ MPFDA की जांच के दायरे में। क्या यह दवा उद्योग में सुधार की शुरुआत है या गुणवत्ता पर बड़ा सवाल?
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मध्य प्रदेश में लगभग 30 दवा कंपनियों पर MPFDA की सख्त निगरानी : एक चेतावनी या बदलाव का अवसर?”
जब स्वास्थ्य-सुरक्षा की गारंटी देने वाला कोई भू-भाग सुर्खियों में आ जाए, तो हमें सिर्फ आंकड़ों से नहीं बल्कि उन वजहों, परिणामों और आगे-की चुनौतियों से भी परिचित होना चाहिए। हाल-ही में, मध्य प्रदेश की दवा विनियामक संस्था MPFDA ने लगभग 30 फार्मा कंपनियों को गुणवत्ता-मानकों के उल्लंघन के संदेह में जाँचना शुरू किया है। यह मामला उस समय अधिक तीव्रता से सामने आया जब बच्चों की मौतें सिरप-दवाओं से जोड़ी गईं।
यह सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं; यह संकेत है कि देश के दवा उत्पादन-प्रक्रिया, आपूर्ति-शृंखला, और विनियामक ढाँचे में सुधार की आवश्यकता कितनी आग पर खड़ी है।
समस्या की जड़ें क्या हैं?
भारत में दवाओं का बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के बावजूद, “सिरप / तरल तैयारियाँ” (oral liquids, syrups, suspensions) अक्सर जोखिम-ग्रस्त मानी जाती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इनमें कंटैमिनेंट (जैसे शोषक सॉल्वैंट), घटिया कच्चे माल या अपर्याप्त गुणवत्ता-निरीक्षण की संभावना अन्य तैयारियों की तुलना में अधिक होती है। एक जांच बताती है कि कुछ इकाइयों में “उद्योग-ग्रेड के सॉल्वैंट इस्तेमाल किए गए, कच्चे माल का परीक्षण नहीं किया गया, और गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रिया कमजोर थी”।
मध्य प्रदेश के मामले में, छिंदवाड़ा और बेतूल जिलों में बच्चों की मौतें और एक सिरप ब्रांड में अत्यधिक मात्रा में विषाक्त सॉल्वैंट (डीएइथिलीनी ग्लाइकोल — DEG) पाए जाने की रिपोर्ट के बाद गतिविधि तेज हुई है।
इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि दवा-उद्योग में सिर्फ उत्पादन चलाना पर्याप्त नहीं — निरंतर निरीक्षण, पारदर्शिता और गुणवत्ता-प्रमाणीकरण बेहद आवश्यक हैं।
इस कार्रवाई का क्या महत्व है?
जब MPFDA लगभग 30 कंपनियों को स्क्रूटनीनीज़ कर रही है, तो इसके निम्न-प्रमुख मायने हैं:
उपभोक्ता-सुरक्षा की दिशा में बढ़ा कदम : जांच यह सुनिश्चित करेगी कि बाजार में आने वाली दवाएं (विशेष रूप से सिरप/तरल) सुरक्षित हैं, यानी उनमें विषाक्त सॉल्वैंट, किस्म-भेद, या निर्माण-उपरांत परीक्षण की कमी न हो।
उद्योग-मानक सुधार की दिशा में संकेत : कंपनियों के लिए यह आवाज है कि “मानक कट्टरता से पालन होंगे” — निर्माण प्रक्रिया, कच्चा माल, परीक्षण-प्रमाणपत्र आदि में सुधार-दबाव होगा।
विश्वसनीयता और निर्यात-प्रतिष्ठा पर प्रभाव : भारत “दवाईयां बनाने वाला विश्व-खिलाड़ी” कहला सकता है, लेकिन अगर गुणवत्ता-समस्या बार-बार सामने आती है, तो भरोसा कमजोर होगा और निर्यात-मार्केट प्रभावित हो सकती है।
किन चुनौतियों का सामना है?
यह कार्रवाई सरल नहीं है; इसकी राह में अनेक बाधाएँ हैं:
विनियामक क्षमता की कमी : भारत में दवा निर्माण इकाइयों की संख्या बहुत अधिक है, पर निरीक्षण-संख्या, परीक्षण-प्रयोगशालाओं की स्रोत-प्राप्ति पर्याप्त नहीं। उदाहरणतः एक स्रोत में बताया गया है कि सिर्फ लगभग 1,467 निरीक्षक थे जबकि दवा निर्माण इकाइयां 10,500 से अधिक हैं ।
केंद्रीय और राज्य-स्तरीय नियंत्रण में फासला : निर्माण-लाइसेंस राज्य द्वारा दिया जाता है, जबकि केंद्रीय संस्था (Central Drugs Standard Control Organisation – CDSCO) नए दवाओं को मंजूरी देती है — इस विभाजन से निगरानी-दुर्लभ हो सकती है।
कंपनियों का तैयार होना और सुधार करना : छोटे-मध्य आकार की इकाइयाँ, जिनके पास संसाधन कम हैं, उन्हें उच्च-स्तरीय GMP (Good Manufacturing Practices) लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
उपभोक्ता-विश्वास को तुरंत बहाल करना आसान नहीं : एक बार गुणवत्ता-समस्या सामने आने के बाद रोगियों का भरोसा टूट जाता है — इसे लौटाना समय लेता है।
क्या बदलाव संभव हैं?
हाँ — परिवर्तन संभव है, यदि सही दिशा एवं निरंतरता के साथ कदम उठाए जाएँ। कुछ प्रमुख सुझाव हैं:
अनुभव-आधारित निरीक्षण-रैम्प-अप : राज्य-स्तर पर surprise inspections बढ़ानी चाहिए, विभिन्न तैयारियों (विशेष रूप से तरल-दवाओं) का डेटा ट्रैक किया जाना चाहिए।
टीम-सहकार्य और डेटा-शेयरिंग बढ़ें : राज्य एवं केंद्रीय संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय एवं सूचना-विनिमय आवश्यक है।
पारदर्शिता को बढ़ावा : निरीक्षण-रिपोर्ट्स, रद्द उत्पादों की सूची, दोष-पाई इकाइयों की पहचान को सार्वजनिक करना भरोसा बढ़ाता है।
निर्माण इकाइयों में निवेश बढ़े : कंपनियों को आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षण-प्रणाली, कच्चा-माल जांच सुविधा आदि में निवेश करने-का अवसर मिलना चाहिए।
उपभोक्ता जागरूकता : आम नागरिकों को यह जानकारी होनी चाहिए कि दवा कैसे सुरक्षित-मानक के अंतर्गत होनी चाहिए — बैच-नंबर, निर्माता-नाम, प्रमाणपत्र आदि देखें।
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हमारे लिए संदेश
इस पूरे मामले का एक बड़ा संदेश है — दवाई सिर्फ पकड़ने-पीने की वस्तु नहीं है; यह भरोसे, जिम्मेदारी और जीवन-सुरक्षा से जुड़ी हुई है। जब तक निर्माण-प्रक्रिया, परीक्षण-सिस्टम और नियामकीय समर्थन बन-बन कर काम नहीं करेंगे, तब तक “सुरक्षित दवाएँ” का दावा अधूरा रहेगा।
अगर आप, आपके परिवार-जन या परिचित किसी दवाई (विशेष रूप से किसी सिरप/तरल) को ले रहे हैं, तो यह समझें कि “कौन बना रहा है”, “क्या उस निर्माता पर कार्रवाई हो रही है”, “क्या उस दवा-बैच की जानकारी उपलब्ध है” — ये सवाल साइड में नहीं हटने चाहिए।
इस तरह, MPFDA की यह कार्रवाई हमें याद दिलाती है कि सुधार सिर्फ आज की घटना नहीं बल्कि एक लंबी यात्रा है — और हम सब इस यात्रा में हिस्सेदार हैं: निर्माता, नियामक, डॉक्टर, मरीज और नागरिक।
स्रोत्
“30 Pharma Firms Under MPFDA, CDSCO Scanner in Madhya Pradesh.” Medical Dialogues .
Disclaimer
यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।
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