उपराष्ट्रपति ने सिद्ध चिकित्सा को बताया सार्वजनिक स्वास्थ्य का मजबूत आधार, तमिलनाडु में बड़े निवेश की घोषणा

सिद्ध दिवस 2026 में उपराष्ट्रपति ने जीवनशैली रोगों व पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में सिद्ध चिकित्सा की भूमिका को अहम बताया।

LATEST NEWS

ASHISH PRADHAN

1/4/20261 min read

Siddha medicine role in public health as traditional healing integrates with modern healthcare.
Siddha medicine role in public health as traditional healing integrates with modern healthcare.

उपराष्ट्रपति ने सिद्ध चिकित्सा को सार्वजनिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए सराहा

चेन्नई में सिद्ध दिवस समारोह में पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली के विस्तार और आधुनिकीकरण पर जोर

चेन्नई में आयोजित सिद्ध दिवस के राष्ट्रीय समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति ने सिद्ध चिकित्सा पद्धति की सार्वजनिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि यह प्राचीन भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली आधुनिक युग में बढ़ती जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों और पर्यावरणीय स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में अत्यंत प्रभावी साबित हो रही है।

इस अवसर पर तमिलनाडु सरकार द्वारा राज्य भर में सिद्ध चिकित्सा इकाइयों के विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए महत्वाकांक्षी निवेश योजनाओं की घोषणा की गई, जो इस पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं में एकीकृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि सिद्ध चिकित्सा केवल एक उपचार पद्धति नहीं है, बल्कि यह एक समग्र जीवन दर्शन है जो निवारक स्वास्थ्य देखभाल, प्राकृतिक उपचार और मानव शरीर तथा प्रकृति के बीच संतुलन पर आधारित है।

सिद्ध दिवस प्रतिवर्ष महान सिद्ध संत और चिकित्सक अगस्त्य मुनि की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्हें सिद्ध चिकित्सा पद्धति का जनक माना जाता है। इस वर्ष के समारोह में केंद्रीय आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री, प्रख्यात सिद्ध चिकित्सक, शोधकर्ता और स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भाग लिया।

समारोह में सिद्ध चिकित्सा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए कई चिकित्सकों और संस्थानों को सम्मानित किया गया, और सिद्ध औषधियों के निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण और वैज्ञानिक सत्यापन पर केंद्रित कई नई पहलों का शुभारंभ किया गया। इस आयोजन ने सिद्ध चिकित्सा को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने और इसे वैज्ञानिक आधार पर मजबूत बनाने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाया।

सिद्ध चिकित्सा: एक प्राचीन परंपरा का आधुनिक महत्व

सिद्ध चिकित्सा पद्धति भारत की सबसे प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में से एक है, जिसका इतिहास लगभग 5,000 वर्ष पुराना माना जाता है और जो मुख्य रूप से तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रचलित है। यह चिकित्सा पद्धति 18 सिद्धों (ज्ञानी संतों) द्वारा विकसित की गई थी, जिन्होंने प्रकृति, मानव शरीर और रोगों के बीच के संबंधों का गहन अध्ययन किया और उपचार की एक व्यापक प्रणाली विकसित की। सिद्ध चिकित्सा का मूल सिद्धांत यह है कि मानव शरीर ब्रह्मांड का लघु रूप है और शरीर में पांच तत्व - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - के संतुलन पर स्वास्थ्य निर्भर करता है।

आयुष मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान में लगभग 7,000 पंजीकृत सिद्ध चिकित्सक हैं और 300 से अधिक सिद्ध औषधालय एवं अस्पताल संचालित हैं, जिनमें तमिलनाडु में सबसे अधिक संख्या है। केंद्रीय सिद्ध अनुसंधान परिषद द्वारा किए गए अध्ययनों में यह पाया गया है कि सिद्ध औषधियां विशेष रूप से त्वचा रोगों, पाचन विकारों, श्वसन समस्याओं, संधिशोथ और मधुमेह जैसी पुरानी बीमारियों में प्रभावी हैं।

राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान, चेन्नई द्वारा किए गए नैदानिक अध्ययनों में सिद्ध औषधियों की प्रभावशीलता और सुरक्षा को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया गया है, जो इस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों पर खरा उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

सिद्ध चिकित्सा में निदान की एक अनूठी प्रणाली है जिसे 'एण्वगई थेर्वु' (आठ परीक्षण विधियां) कहा जाता है, जिसमें नाड़ी परीक्षण (नाड़ी की जांच), स्पर्शन (स्पर्श द्वारा जांच), ना (जीभ की जांच), निरम (रंग की जांच), मोज़ी (आवाज की जांच), विज़ी (आंखों की जांच), मलम (मल की जांच) और मूत्रम (मूत्र की जांच) शामिल हैं। ये परीक्षण आधुनिक निदान तकनीकों के बिना भी रोग की सटीक पहचान में सहायक होते हैं और रोगी के समग्र स्वास्थ्य की व्यापक समझ प्रदान करते हैं।

जीवनशैली रोगों से निपटने में सिद्ध चिकित्सा की भूमिका

आधुनिक युग में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जैसे कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, हृदय रोग और तनाव संबंधी विकार तेजी से बढ़ रहे हैं, और यहां सिद्ध चिकित्सा अपनी समग्र और निवारक दृष्टिकोण के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

उपराष्ट्रपति ने अपने भाषण में इस बात पर विशेष जोर दिया कि सिद्ध चिकित्सा केवल लक्षणों का उपचार नहीं करती, बल्कि रोग के मूल कारण को दूर करने और शरीर की प्राकृतिक उपचार क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करती है। सिद्ध चिकित्सा में आहार (पथियम), योग, ध्यान और जीवनशैली में परिवर्तन को उपचार का अभिन्न अंग माना जाता है, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है।

तमिलनाडु सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि टाइप 2 मधुमेह के रोगियों में सिद्ध औषधियों और आहार नियंत्रण के संयुक्त उपयोग से रक्त शर्करा के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई और रोगियों को कम मात्रा में एलोपैथिक दवाओं की आवश्यकता पड़ी। इसी प्रकार, 'निलवेम्बु कुडिनीर' नामक सिद्ध काढ़ा डेंगू बुखार की रोकथाम और उपचार में प्रभावी पाया गया है और तमिलनाडु सरकार ने इसे डेंगू के प्रकोप के दौरान व्यापक रूप से वितरित किया है। 'कबासुरा कुडिनीर' नामक एक अन्य सिद्ध फॉर्मूलेशन कोविड-19 महामारी के दौरान श्वसन लक्षणों को कम करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक पाया गया, और आयुष मंत्रालय ने इसके उपयोग को अनुमोदित किया था।

राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान के निदेशक डॉ. आर. मीनाक्षीसुंदरम ने एक साक्षात्कार में कहा कि "सिद्ध चिकित्सा में ऐसी अनेक औषधियां और फॉर्मूलेशन हैं जो चयापचय संबंधी विकारों, सूजन संबंधी रोगों और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में अत्यंत प्रभावी हैं। हमारे शोध में यह पाया गया है कि सिद्ध औषधियों के दुष्प्रभाव न्यूनतम हैं और ये दीर्घकालिक उपयोग के लिए सुरक्षित हैं। हमें इन औषधियों का व्यापक नैदानिक परीक्षण करने और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर प्रमाणित करने की आवश्यकता है।"

Also Read:

WHO का ऐतिहासिक कदम: आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा को वैश्विक मान्यता देने की दिशा में बड़ी पहल

यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (UHC) Day 2025: क्या भारत 2030 तक सभी को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण इलाज दे पाएगा?

पर्यावरणीय स्वास्थ्य और सतत विकास

उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में इस बात पर भी प्रकाश डाला कि सिद्ध चिकित्सा पर्यावरणीय स्वास्थ्य और सतत विकास के सिद्धांतों के अनुरूप है, क्योंकि यह मुख्य रूप से प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त जड़ी-बूटियों, खनिजों और धातुओं पर आधारित है। सिद्ध चिकित्सा में औषधि निर्माण में स्थानीय रूप से उपलब्ध पौधों और सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, जो पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देता है।

तमिलनाडु में औषधीय पौधों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा किसानों को प्रशिक्षण और सब्सिडी प्रदान की जा रही है, जिससे न केवल औषधीय पौधों की उपलब्धता बढ़ेगी बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होंगे।

सिद्ध चिकित्सा में 'यत्रम' (यात्रा या पंचकर्म) के माध्यम से शरीर की विषहरण (डिटॉक्सिफिकेशन) प्रक्रिया पर भी जोर दिया जाता है, जो आधुनिक प्रदूषित वातावरण में रहने वाले लोगों के लिए विशेष रूप से लाभदायक है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों के कारण शरीर में जमा होने वाले विषाक्त पदार्थ कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनते हैं, और सिद्ध चिकित्सा की विषहरण प्रक्रियाएं इन्हें प्रभावी रूप से निकालने में सहायक होती हैं।

राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान के एक अध्ययन में यह पाया गया कि कुछ सिद्ध औषधियां भारी धातुओं के विषाक्त प्रभावों को कम करने में सक्षम हैं, जो औद्योगिक क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है।

तमिलनाडु में सिद्ध चिकित्सा का विस्तार: निवेश और योजनाएं

सिद्ध दिवस समारोह में तमिलनाडु सरकार ने राज्य भर में सिद्ध चिकित्सा सेवाओं के विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए महत्वाकांक्षी योजनाओं की घोषणा की। राज्य सरकार ने अगले पांच वर्षों में 500 करोड़ रुपये के निवेश से 100 नए सिद्ध औषधालयों की स्थापना, मौजूदा सिद्ध अस्पतालों का आधुनिकीकरण और सिद्ध औषधि निर्माण इकाइयों की क्षमता वृद्धि की योजना बनाई है। इसके अलावा, प्रत्येक जिले में कम से कम एक 50 बिस्तरों वाला सिद्ध अस्पताल स्थापित किया जाएगा, जहां आउट-पेशेंट और इन-पेशेंट दोनों सेवाएं उपलब्ध होंगी।

तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री ने घोषणा की कि राज्य सरकार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सिद्ध चिकित्सकों की नियुक्ति करेगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में भी सिद्ध चिकित्सा सेवाएं सुलभ हो सकें।

तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन द्वारा संचालित सिद्ध औषधि निर्माण इकाई, अरुम्बाक्कम का विस्तार किया जाएगा और इसकी उत्पादन क्षमता को दोगुना किया जाएगा। यह इकाई वर्तमान में 200 से अधिक प्रकार की सिद्ध औषधियों का निर्माण करती है और इन्हें सरकारी अस्पतालों और औषधालयों को आपूर्ति करती है। सरकार ने सिद्ध औषधियों की गुणवत्ता नियंत्रण और मानकीकरण के लिए एक अत्याधुनिक प्रयोगशाला की स्थापना की योजना भी बनाई है, जो औषधियों में सक्रिय घटकों की पहचान, शुद्धता परीक्षण और भारी धातुओं या हानिकारक पदार्थों की उपस्थिति की जांच करेगी। यह पहल सिद्ध औषधियों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में स्वीकार्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

राज्य सरकार ने सिद्ध चिकित्सा शिक्षा को मजबूत करने के लिए भी कई कदम उठाए हैं। तमिलनाडु में वर्तमान में 8 सिद्ध मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें सालाना लगभग 600 छात्र बैचलर ऑफ सिद्ध मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएसएमएस) की पढ़ाई करते हैं।

सरकार ने घोषणा की है कि इन कॉलेजों में सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी और पोस्ट-ग्रेजुएट और शोध कार्यक्रमों को विस्तारित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, सिद्ध चिकित्सकों के लिए निरंतर व्यावसायिक विकास कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें आधुनिक निदान तकनीकों, फार्माकोलॉजी और अनुसंधान पद्धतियों का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

Siddha medicine herbs and classical texts showing integration of traditional healthcare in India
Siddha medicine herbs and classical texts showing integration of traditional healthcare in India

अनुसंधान और नवाचार: सिद्ध चिकित्सा का वैज्ञानिक सत्यापन

सिद्ध चिकित्सा को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं में एकीकृत करने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य बनाने के लिए इसका वैज्ञानिक सत्यापन और नैदानिक परीक्षण अत्यंत आवश्यक है। केंद्रीय सिद्ध अनुसंधान परिषद द्वारा देश भर में स्थापित अनुसंधान संस्थानों में सिद्ध औषधियों के फार्माकोलॉजिकल, टॉक्सिकोलॉजिकल और क्लिनिकल अध्ययन किए जा रहे हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के सहयोग से कई सिद्ध फॉर्मूलेशन पर बहु-केंद्रीय यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण आयोजित किए जा रहे हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं।

तमिलनाडु डॉ. एमजीआर मेडिकल यूनिवर्सिटी में स्थापित सिद्ध चिकित्सा अनुसंधान केंद्र में संधिशोथ (आर्थराइटिस) के उपचार में सिद्ध औषधियों की प्रभावशीलता पर एक दीर्घकालिक अध्ययन चल रहा है, जिसके प्रारंभिक परिणाम अत्यंत उत्साहजनक हैं। अध्ययन में यह पाया गया कि 'निरुगुण्डी चूर्णम' और 'कोष्ठम' जैसी सिद्ध औषधियां संधिशोथ के दर्द और सूजन को कम करने में एलोपैथिक दवाओं के समान प्रभावी हैं, लेकिन इनके दुष्प्रभाव बहुत कम हैं।

इसी प्रकार, एक्जिमा और सोरायसिस जैसे त्वचा रोगों के उपचार में 'वेंपटई चूर्णम' और 'सिधावादी तैलम' की प्रभावशीलता पर किए गए अध्ययन में सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

आईआईटी मद्रास और राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान के बीच सहयोग से सिद्ध औषधियों के सक्रिय घटकों की पहचान और उनकी क्रियाविधि को समझने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों जैसे कि जीनोमिक्स, प्रोटियोमिक्स और मेटाबोलोमिक्स का उपयोग किया जा रहा है। यह शोध सिद्ध औषधियों को वैज्ञानिक आधार पर समझने और उनकी प्रभावशीलता को बढ़ाने में सहायक होगा। इसके अलावा, नैनो-टेक्नोलॉजी का उपयोग करके सिद्ध औषधियों की बायोएवेलेबिलिटी (जैवउपलब्धता) को बढ़ाने पर भी शोध चल रहा है, जिससे कम मात्रा में औषधि से अधिक प्रभाव प्राप्त किया जा सकेगा।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पहचान की दिशा में प्रयास

भारत सरकार सिद्ध चिकित्सा को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने के लिए कई पहल कर रही है। आयुष मंत्रालय ने सिद्ध चिकित्सा के दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण के लिए एक व्यापक परियोजना शुरू की है, जिसमें प्राचीन सिद्ध ग्रंथों और पांडुलिपियों का अनुवाद, संरक्षण और ऑनलाइन उपलब्ध कराया जा रहा है।

'सिद्ध पॉश' (सिद्ध फार्माकोपिया) के विकास पर कार्य चल रहा है, जो सिद्ध औषधियों के मानकीकरण के लिए एक आधिकारिक संदर्भ दस्तावेज होगा। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन की फार्माकोपिया आवश्यकताओं के अनुरूप होगा और सिद्ध औषधियों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में स्वीकृति दिलाने में सहायक होगा।

भारत सरकार ने विदेशों में सिद्ध चिकित्सा केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई है, जिससे प्रवासी भारतीयों और अन्य देशों के नागरिकों को सिद्ध चिकित्सा सेवाओं का लाभ मिल सके। मलेशिया, सिंगापुर और खाड़ी देशों में, जहां बड़ी संख्या में तमिल प्रवासी रहते हैं, सिद्ध चिकित्सा की मांग बढ़ रही है।

आयुष मंत्रालय ने विदेशी चिकित्सकों और शोधकर्ताओं के लिए सिद्ध चिकित्सा में प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिससे इस पारंपरिक ज्ञान का वैश्विक प्रसार हो सके। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को स्वास्थ्य सेवाओं में एकीकृत करने के महत्व को स्वीकार किया है और सिद्ध चिकित्सा को इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ ट्रेडिशनल मेडिसिन में शामिल करने पर विचार कर रहा है।

चुनौतियां और भविष्य की दिशा

सिद्ध चिकित्सा के विकास और विस्तार के मार्ग में कई चुनौतियां भी हैं, जिनका समाधान करना आवश्यक है। सबसे प्रमुख चुनौती है प्रशिक्षित सिद्ध चिकित्सकों की कमी, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में।

सिद्ध चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्ता सुधार और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के साथ पारंपरिक ज्ञान का एकीकरण आवश्यक है। औषधीय पौधों की घटती उपलब्धता और जंगली औषधीय पौधों का अत्यधिक दोहन भी चिंता का विषय है, जिसके लिए सतत कृषि और संरक्षण रणनीतियों की आवश्यकता है। सिद्ध औषधियों की गुणवत्ता नियंत्रण और मानकीकरण एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि कच्चे माल की गुणवत्ता, संग्रह का समय और निर्माण प्रक्रिया औषधि की प्रभावशीलता को प्रभावित करते हैं।

सिद्ध चिकित्सा के प्रति समाज में जागरूकता की कमी और आधुनिक चिकित्सा की ओर बढ़ता झुकाव भी एक चुनौती है। युवा पीढ़ी में सिद्ध चिकित्सा को करियर के रूप में चुनने की प्रवृत्ति कम है, जिसके लिए बेहतर रोजगार अवसर और आकर्षक वेतन सुनिश्चित करना आवश्यक है। एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली के साथ सिद्ध चिकित्सा का एकीकरण और समन्वय भी एक चुनौती है, जिसके लिए दोनों प्रणालियों के बीच बेहतर संवाद और सहयोग की आवश्यकता है।

सिद्ध चिकित्सकों को आधुनिक निदान तकनीकों और आपातकालीन चिकित्सा में प्रशिक्षित करना और एलोपैथिक चिकित्सकों को सिद्ध चिकित्सा के सिद्धांतों से परिचित कराना एक समन्वित स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के निर्माण में सहायक होगा।

निष्कर्ष

सिद्ध दिवस समारोह में उपराष्ट्रपति द्वारा सिद्ध चिकित्सा की सराहना और तमिलनाडु सरकार द्वारा इसके विस्तार के लिए घोषित योजनाएं भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को पुनर्जीवित करने और उन्हें आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं में एकीकृत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

सिद्ध चिकित्सा, जो हजारों वर्षों के अनुभव और ज्ञान पर आधारित है, आधुनिक युग की स्वास्थ्य चुनौतियों, विशेष रूप से जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों और पर्यावरणीय स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि सिद्ध चिकित्सा का वैज्ञानिक सत्यापन किया जाए, इसकी गुणवत्ता और मानकीकरण सुनिश्चित किया जाए, और इसे व्यापक रूप से सुलभ बनाया जाए।

सरकार, अनुसंधान संस्थानों, शिक्षा संस्थानों और सिद्ध चिकित्सकों के सामूहिक प्रयासों से सिद्ध चिकित्सा को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक सम्मानित और प्रभावी चिकित्सा प्रणाली के रूप में स्थापित किया जा सकता है। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु बनाकर, हम एक ऐसी समग्र स्वास्थ्य सेवा प्रणाली विकसित कर सकते हैं जो प्रभावी, सुलभ, वहनीय और पर्यावरणीय रूप से सतत हो। सिद्ध चिकित्सा न केवल भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वास्थ्य और कल्याण का एक मूल्यवान संसाधन भी है।

संदर्भ और स्रोत:

  1. आयुष मंत्रालय, भारत सरकार - सिद्ध चिकित्सा विभाग की आधिकारिक रिपोर्ट

  2. केंद्रीय सिद्ध अनुसंधान परिषद, भारत सरकार

  3. राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान, चेन्नई - शोध प्रकाशन

  4. तमिलनाडु स्वास्थ्य विभाग - सिद्ध दिवस 2024 आधिकारिक विज्ञप्ति

  5. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद - पारंपरिक चिकित्सा पर अध्ययन

  6. विश्व स्वास्थ्य संगठन - पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2014-2023

  7. तमिलनाडु डॉ. एमजीआर मेडिकल यूनिवर्सिटी - सिद्ध चिकित्सा शोध केंद्र

  8. द हिंदू, द टाइम्स ऑफ इंडिया - सिद्ध दिवस समारोह संबंधी समाचार रिपोर्ट (4 जनवरी 2026)

नोट: यह लेख सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए कृपया योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

Follow us

Related Stories

Trending Tips