कार्डियो-मेटाबॉलिक जोखिम और एस्पिरिन: भारतीय मरीजों में किसे फायदा, किसे खतरा?

भारत में हार्ट अटैक और डायबिटीज़ का खतरा कम उम्र में बढ़ रहा है। क्या ऐसे मरीजों के लिए एस्पिरिन सुरक्षित है? जानिए भारतीय संदर्भ में क्लिनिकल ट्रायल्स, विशेषज्ञ राय और नई गाइडलाइंस क्या कहती हैं।

MEDICAL NEWSPHARMA NEWS

ASHISH PRADHAN

12/19/20251 min read

Evidence-based view on aspirin use for cardio-metabolic risk in Indian patients.
Evidence-based view on aspirin use for cardio-metabolic risk in Indian patients.

कार्डियो-मेटाबॉलिक जोखिम और एस्पिरिन: भारतीय मरीजों के लिए सबूत क्या कहते हैं?”

परिचय

भारत इस समय एक ऐसे निर्णायक दौर से गुजर रहा है, जहाँ हृदय रोग और मेटाबॉलिक विकार मिलकर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुके हैं। डायबिटीज़, मोटापा, डिस्लिपिडेमिया और हाई ब्लड प्रेशर जैसे जोखिम कारक अब अलग-अलग समस्याएँ नहीं रह गए हैं, बल्कि वे एक साथ मिलकर भारतीय वयस्क आबादी—विशेषकर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों—को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं।

पिछले दो दशकों में सामने आई क्लिनिकल स्टडीज़ और अंतरराष्ट्रीय व भारतीय गाइडलाइंस ने इस बहस को और गहरा किया है कि ऐसे उच्च जोखिम वाले मरीजों में एस्पिरिन की वास्तविक भूमिका क्या होनी चाहिए। दुनिया भर में इस दवा का उपयोग लंबे समय तक हृदय रोग की रोकथाम के लिए किया जाता रहा है, लेकिन भारतीय संदर्भ में जोखिम प्रोफाइल अलग होने के कारण इसके लाभ और संभावित नुकसान पर दोबारा विचार करना आवश्यक हो गया है।

भारत में अपेक्षाकृत कम उम्र में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और डायबिटीज़ की शुरुआत इस प्रश्न को और भी महत्वपूर्ण बना देती है—क्या कार्डियो-मेटाबॉलिक जोखिम वाले हर भारतीय मरीज को एस्पिरिन दी जानी चाहिए, या अब इसका उपयोग अधिक चयनित और व्यक्तिगत आकलन के आधार पर होना चाहिए?

इन्हीं वैज्ञानिक प्रमाणों, क्लिनिकल ट्रायल्स और विशेषज्ञों की राय के आधार पर यह लेख यह समझने का प्रयास करता है कि एस्पिरिन किन मरीजों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है और किन परिस्थितियों में यह जोखिम बढ़ा सकती है।

भारत में कार्डियो-मेटाबॉलिक जोखिम: पृष्ठभूमि और संदर्भ

भारत में कार्डियो-मेटाबॉलिक जोखिम केवल मोटापे तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ इसे “थिन-फैट इंडियन फिनोटाइप” कहते हैं, जहाँ व्यक्ति दिखने में दुबला हो सकता है लेकिन उसके शरीर में विसरल फैट, इंसुलिन रेजिस्टेंस और एथेरोस्क्लेरोसिस का खतरा अधिक होता है।

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भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, भारत में:

  • डायबिटीज़ और प्री-डायबिटीज़ की शुरुआत अपेक्षाकृत कम उम्र में होती है

  • हाई ब्लड प्रेशर और डिस्लिपिडेमिया अक्सर बिना लक्षण के रहते हैं

  • हार्ट अटैक और स्ट्रोक की घटनाएँ पश्चिमी देशों की तुलना में 8–10 साल पहले हो जाती हैं

इसी संदर्भ में, दशकों तक लो-डोज़ एस्पिरिन को “सुरक्षित और सस्ती” दवा मानकर प्राथमिक रोकथाम (Primary Prevention) में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया।

एस्पिरिन: एक पुरानी दवा, नया सवाल

एस्पिरिन का इतिहास सौ साल से भी पुराना है। इसका मुख्य मैकेनिज़्म ऑफ एक्शन प्लेटलेट्स को आपस में चिपकने से रोकना है, जिससे ब्लड क्लॉट (थक्का) बनने की संभावना कम होती है।

यही कारण है कि:

  • हार्ट अटैक के बाद

  • स्ट्रोक के बाद

  • स्टेंट या बायपास सर्जरी के बाद

सेकेंडरी प्रिवेंशन में एस्पिरिन की भूमिका आज भी स्पष्ट और स्थापित है। लेकिन विवाद तब शुरू हुआ जब सवाल उठा कि क्या बिना हार्ट अटैक या स्ट्रोक वाले, लेकिन हाई रिस्क भारतीय मरीजों में भी एस्पिरिन जरूरी है?

प्राथमिक रोकथाम में एस्पिरिन: सबूत क्या कहते हैं?

पिछले 10–15 वर्षों में कई बड़े अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल ट्रायल्स सामने आए, जिनमें शामिल हैं:

  • ASCEND Trial (डायबिटीज़ मरीजों में)

  • ARRIVE Trial (मध्यम जोखिम वाले मरीजों में)

  • ASPREE Trial (बुजुर्ग आबादी में)

इन अध्ययनों का समग्र निष्कर्ष यह रहा कि:

  • एस्पिरिन से कुछ हद तक हार्ट अटैक का जोखिम कम हो सकता है

  • लेकिन उसी अनुपात में गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल ब्लीडिंग और ब्रेन हेमरेज का खतरा बढ़ जाता है

यानी लाभ और जोखिम के बीच संतुलन बहुत नाज़ुक है।

भारतीय संदर्भ में चुनौती क्यों अलग है?

भारत में यह बहस और जटिल हो जाती है क्योंकि:

  1. ब्लीडिंग रिस्क: भारतीयों में पेट से जुड़ी समस्याएँ और एनीमिया पहले से अधिक पाए जाते हैं

  2. ओवर-द-काउंटर उपयोग: एस्पिरिन आसानी से बिना पर्चे के मिल जाती है

  3. स्व-चिकित्सा (Self-Medication): लोग “हार्ट के लिए फायदेमंद” समझकर वर्षों तक दवा लेते रहते हैं

वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट्स का मानना है कि पश्चिमी गाइडलाइंस को सीधे-सीधे भारतीय आबादी पर लागू करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।

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विशेषज्ञों की राय: चयनित मरीजों में ही उपयोग

मेडिकल जर्नल्स और भारतीय कार्डियोलॉजी सोसाइटी से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार:

“आज के समय में एस्पिरिन को ‘वन-साइज़-फिट्स-ऑल’ दवा नहीं माना जा सकता। इसे केवल उन मरीजों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिनका कार्डियोवैस्कुलर जोखिम बहुत अधिक हो और ब्लीडिंग का खतरा कम।”

डायबिटीज़, स्मोकिंग, हाई LDL कोलेस्ट्रॉल और फैमिली हिस्ट्री जैसे फैक्टर्स को मिलाकर ही फैसला लिया जाना चाहिए।

एस्पिरिन के संभावित फायदे

  • प्लेटलेट एग्रीगेशन कम करना

  • हार्ट अटैक और इस्केमिक स्ट्रोक का जोखिम घटाना

  • सेकेंडरी प्रिवेंशन में जीवनरक्षक भूमिका

संभावित दुष्प्रभाव और जोखिम

  • पेट में अल्सर और ब्लीडिंग

  • दिमाग में रक्तस्राव (रेयर लेकिन गंभीर)

  • बुजुर्गों में गिरने पर जटिलताएँ

इसी कारण आधुनिक गाइडलाइंस “रूटीन” उपयोग से बचने की सलाह देती हैं।

उपचार की बदलती रणनीति: एस्पिरिन से आगे

आज कार्डियो-मेटाबॉलिक जोखिम प्रबंधन केवल एक दवा पर निर्भर नहीं है। इसमें शामिल हैं:

  • स्टैटिन्स द्वारा कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण

  • ब्लड प्रेशर का सख्त प्रबंधन

  • लाइफस्टाइल बदलाव—डाइट, एक्सरसाइज़, वजन नियंत्रण

  • नई एंटी-डायबिटिक दवाएँ जो हार्ट को भी सुरक्षा देती हैं

एस्पिरिन अब इस रणनीति का केवल एक छोटा, चयनित हिस्सा बन गई है।

निष्कर्ष

भारतीय मरीजों के लिए कार्डियो-मेटाबॉलिक जोखिम और एस्पिरिन का रिश्ता अब पहले जैसा सरल नहीं रहा। जहाँ एक समय इसे लगभग हर हाई-रिस्क व्यक्ति को देने की प्रवृत्ति थी, वहीं आज विज्ञान हमें अधिक संतुलित और व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाने को कहता है।

भविष्य में भारत-विशेष क्लिनिकल डेटा और गाइडलाइंस इस निर्णय को और स्पष्ट करेंगे। तब तक विशेषज्ञों की सलाह यही है—डॉक्टर से परामर्श के बिना एस्पिरिन शुरू या बंद न करें।

यह बदलाव न केवल मरीजों की सुरक्षा बढ़ाएगा, बल्कि भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में प्रमाण-आधारित चिकित्सा (Evidence-Based Medicine) को भी मजबूती देगा।

References

  1. American College of Cardiology & American Heart Association Guidelines (2019–2023)

  2. ASCEND, ARRIVE और ASPREE Trials – प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स

  3. Indian Council of Medical Research (ICMR) – कार्डियो-मेटाबॉलिक रिस्क रिपोर्ट्स

  4. Medical Dialogues में प्रकाशित विशेषज्ञ विश्लेषण, दिसंबर 2025

यह लेख सूचना और जनहित के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी दवा का उपयोग चिकित्सकीय सलाह के बिना न करें।

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