HIV मरीज की निजता का उल्लंघन: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दो लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया — चिकित्सा नैतिकता और संविधान पर बड़ा संदेश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी अस्पताल द्वारा HIV मरीज की निजता भंग करने पर राज्य सरकार को दो लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया। यह फैसला चिकित्सा नैतिकता, संवैधानिक अधिकार और गोपनीयता के सम्मान पर गहरा संदेश देता है।
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रोगी की निजता का उल्लंघन: सरकारी अस्पताल ने HIV स्थिति सार्वजनिक की, हाईकोर्ट ने दो लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया — संवैधानिक अधिकार और चिकित्सा नैतिकता पर एक गहन विमर्श”
भारत के छत्तीसगढ़ राज्य से आई यह घटना न केवल एक कानूनी फैसला है, बल्कि यह हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य-तंत्र, नैतिकता और संवैधानिक अधिकारों की गहराई तक झकझोर देने वाली मिसाल भी बन गई है। रायपुर स्थित डॉक्टर भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल में एक नवजात शिशु के बिस्तर के पास यह लिखकर लगाया गया कि “इस शिशु की माता HIV-पॉजिटिव हैं।” यह एक साधारण सूचना नहीं थी, बल्कि एक ऐसा सार्वजनिक खुलासा था जिसने रोगी और उसके परिवार की गोपनीयता को तार-तार कर दिया। इस घटना ने भारत के संविधान में निहित Right to Privacy (निजता का अधिकार) और Right to Dignity (गरिमा का अधिकार) दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
हाईकोर्ट ने 10 अक्टूबर 2025 को इस मामले पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अस्पताल का यह रवैया “अमानवीय, अनैतिक और असंवेदनशील” है। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह पीड़ित परिवार को चार सप्ताह के भीतर दो लाख रुपये का मुआवजा दे, साथ ही यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में इस तरह का उल्लंघन न हो।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि स्वास्थ्य विभाग HIV/AIDS (Prevention and Control) Act, 2017 के प्रावधानों का कड़ाई से पालन कराए और सभी चिकित्सा-कर्मियों को रोगी-गोपनीयता संबंधी प्रशिक्षण दिया जाए।
यह मामला हमें यह याद दिलाता है कि चिकित्सा सेवा का उद्देश्य केवल रोग का उपचार भर नहीं होता; उसमें रोगी की निजता, आत्म-सम्मान और सामाजिक सुरक्षा का संरक्षण भी शामिल होता है। विशेष रूप से जब बात HIV जैसी संवेदनशील स्थिति की हो, जहाँ समाज अभी भी भेदभाव और कलंक से जूझ रहा है, तब गोपनीयता की आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है।
भारत में HIV/AIDS 2017 अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी व्यक्ति की HIV स्थिति बिना उसकी लिखित अनुमति के सार्वजनिक नहीं की जा सकती। बावजूद इसके, इस अस्पताल-घटना ने यह साबित किया कि नीति-स्तर पर मौजूद कानून तब तक प्रभावी नहीं होंगे जब तक वे व्यवहार में लागू न किए जाएँ।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला दरअसल पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। यह बताता है कि मरीज की गोपनीयता कोई औपचारिकता नहीं बल्कि संविधान-सम्मत मौलिक अधिकार है। न्यायालय ने यह भी माना कि ऐसे खुलासे रोगी और उसके परिवार के लिए सामाजिक-कलंक, मानसिक-आघात और भविष्य-असुरक्षा का कारण बन सकते हैं। न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में कहा कि “अस्पताल का दायित्व केवल शारीरिक उपचार तक सीमित नहीं; यह रोगी की गरिमा और सम्मान की रक्षा करने तक विस्तृत है।”
इस घटना से जुड़ी व्यापक पृष्ठभूमि यह भी दर्शाती है कि भारत में HIV संक्रमित व्यक्तियों के साथ आज भी सामाजिक दूरी और भेदभाव व्याप्त है।
एक सरकारी अस्पताल जैसे संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संवेदनशील जानकारी को पूर्ण गोपनीयता में रखे, ताकि रोगी उपचार लेने में आत्म-विश्वास महसूस करे। लेकिन जब वही संस्थान निजता तोड़ देता है, तो न केवल एक व्यक्ति का अधिकार टूटता है बल्कि समाज-में-विश्वास की पूरी संरचना हिल जाती है।
कानूनी परिप्रेक्ष्य से, यह मामला यह स्थापित करता है कि स्वास्थ्य-संस्थाएँ सिर्फ चिकित्सा सेवा देने वाली इकाइयाँ नहीं, बल्कि संवैधानिक उत्तरदायित्व निभाने वाले अंग हैं। HIV/AIDS Act 2017, भारतीय चिकित्सा परिषद (Medical Council of India) के आचार संहिता नियम और सुप्रीम कोर्ट का Justice K.S. Puttaswamy vs Union of India (2017) फैसला — सभी यह दोहराते हैं कि व्यक्ति की निजता एक मौलिक अधिकार है। इसलिए, किसी भी सरकारी या निजी संस्था द्वारा इसका उल्लंघन सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के खिलाफ जाता है।
सामाजिक और नैतिक दृष्टि से, यह घटना यह दिखाती है कि भारत में अभी भी चिकित्सा-कर्मियों के बीच संवेदनशीलता की गंभीर कमी है। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीज को अक्सर केवल एक केस-फाइल या नंबर की तरह देखा जाता है, जबकि उसके पीछे एक सामाजिक और भावनात्मक जीवन होता है। गोपनीयता का तात्पर्य केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की आत्म-गरिमा की रक्षा है।
विशेषज्ञों की राय में, इस तरह की घटनाओं से आम जनता का अस्पतालों पर विश्वास कम होता है, और HIV जैसे रोगों की जांच या उपचार के लिए लोग आने से हिचकिचाते हैं।
यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है, क्योंकि इससे संक्रमण-नियंत्रण के प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को हर स्तर पर गोपनीयता-संबंधी प्रशिक्षण को अनिवार्य करना चाहिए और हर अस्पताल में “Confidentiality Compliance Audit” जैसे तंत्र लागू करने चाहिए।
नैतिक चिकित्सा-दृष्टिकोण से, यह आवश्यक है कि प्रत्येक चिकित्सक, नर्स, पैरामेडिकल और प्रशासनिक अधिकारी यह समझे कि मरीज-सूचना कोई “डेटा” नहीं, बल्कि व्यक्ति की गरिमा का हिस्सा है। ऐसे में किसी भी रोग-स्थिति की जानकारी बिना अनुमति साझा करना या सार्वजनिक करना, चिकित्सा-नैतिकता की आत्मा के खिलाफ है।
भविष्य की दृष्टि से, इस निर्णय ने भारत की स्वास्थ्य-नीति-निर्माण को नया दिशा-सूचक दिया है। अब राज्य-सरकारों और केंद्र-स्वास्थ्य-मंत्रालय को चाहिए कि वे अस्पतालों के लिए गोपनीयता-नीति (Privacy Policy) को कानून-समान अनिवार्य करें, और इसका उल्लंघन करने वालों पर अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करें। साथ ही, रोगी-जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जाएँ ताकि आम नागरिक यह समझ सके कि उसकी स्वास्थ्य-जानकारी उसकी सहमति के बिना किसी को साझा नहीं की जा सकती।
आख़िरकार, यह मामला केवल एक नवजात शिशु या उसकी HIV-पॉजिटिव माता का नहीं है, बल्कि यह हर उस नागरिक का है जो उम्मीद करता है कि अस्पताल में उसका उपचार उसके आत्म-सम्मान और गोपनीयता के साथ होगा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला भारत की न्याय-व्यवस्था के उस मानवीय चेहरे को सामने लाता है जो यह कहता है — “स्वास्थ्य-सेवा का उद्देश्य केवल शरीर को ठीक करना नहीं, बल्कि मन और गरिमा को भी सुरक्षित रखना है।”
Disclaimer
यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।
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