खांसी सिरप विवाद के बाद दिल्ली में बड़ी कार्रवाई: RDCA ने फार्मेसी अनुपालन को लेकर सख्ती बढ़ाई

भारत में खांसी सिरप विवाद के बाद अब दिल्ली की दवा दुकानों पर नियामक शिकंजा कस गया है। दिल्ली फ़ार्मेसी काउंसिल (DPC) ने स्पष्ट निर्देश जारी किया है कि अब कोई भी दवा तभी मिल सकेगी जब दुकान पर एक पंजीकृत फार्मासिस्ट (Registered Pharmacist) मौजूद होगा। इस आदेश को लागू कराने के लिए रिटेल डिस्ट्रिब्यूशन केमिस्ट्स अलायंस (RDCA) ने सभी फार्मेसियों को अनुपालन (Compliance) सुनिश्चित करने के लिए चेतावनी जारी की है। यह कदम तब आया है जब देशभर में दवा गुणवत्ता और सुरक्षा पर सवाल उठे हैं। फार्मेसी अधिनियम 1948 और जन विश्वास अधिनियम 2023 के तहत अब उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना या जेल की सजा हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव न केवल मरीजों की सुरक्षा बढ़ाएगा बल्कि फार्मेसी पेशे में पारदर्शिता और भरोसा भी लौटाएगा।

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ASHISH PRADHAN

10/21/20251 min read

Delhi RDCA issues compliance alert to pharmacies after cough syrup controversy
Delhi RDCA issues compliance alert to pharmacies after cough syrup controversy

Cough Syrup Controversy से सबक: दिल्ली में RDCA का सख्त अलर्ट — बिना Registered Pharmacist के अब नहीं बिकेंगी दवाएं”
भूमिका

दिल्ली के औषधि क्षेत्र में एक नई हलचल तब मची जब दिल्ली फार्मेसी काउंसिल (DPC) ने हाल ही में एक सख्त सर्कुलर जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया कि अब किसी भी दवा की कंपाउंडिंग, मिक्सिंग या डिस्पेंसिंग केवल पंजीकृत फार्मासिस्ट (Registered Pharmacist) द्वारा ही की जा सकती है। इस सर्कुलर के जारी होने के तुरंत बाद, रीटेल डिस्ट्रीब्यूशन केमिस्ट्स अलायंस (RDCA) — जो दिल्ली के दवा विक्रेताओं और फार्मासिस्टों का प्रमुख संगठन है — ने अपने सभी सदस्यों को एक चेतावनी पत्र जारी करते हुए कहा है कि वे तुरंत फार्मेसी एक्ट, 1948 के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करें, अन्यथा उन्हें कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

यह चेतावनी तब आई है जब हाल ही में मध्य प्रदेश में खांसी की सिरप से जुड़ी विवादास्पद घटनाओं के बाद, देशभर के औषधि नियामक संस्थानों ने फार्मेसी संचालन में व्याप्त अनियमितताओं पर ध्यान केंद्रित किया है।


DPC का यह आदेश और RDCA की तत्परता न केवल औषधि विक्रेताओं के लिए चेतावनी है, बल्कि पूरे देश में फार्मेसी सेक्टर की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर एक बड़ा संदेश भी देती है।

फार्मेसी एक्ट 1948 की सख्त शर्तें — क्या कहता है कानून?

फार्मेसी एक्ट, 1948 के सेक्शन 42 के अनुसार, किसी भी चिकित्सा नुस्खे (Prescription) पर आधारित दवा को तैयार करने, मिलाने या वितरित करने का अधिकार केवल एक पंजीकृत फार्मासिस्ट को होता है।
यदि कोई व्यक्ति बिना पंजीकरण के इस प्रक्रिया में शामिल पाया जाता है, तो यह कानूनी अपराध माना जाता है।


हाल ही में जन विश्वास (संशोधन) अधिनियम, 2023 (Jan Vishwas Amendment Act, 2023) के तहत इस कानून में बदलाव करते हुए दंड प्रावधानों को और कठोर बनाया गया है। अब गैर-अनुपालन की स्थिति में 6 महीने तक की सजा, 1 लाख रुपये तक का जुर्माना, या दोनों का प्रावधान किया गया है।

DPC ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य में सभी फार्मेसियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके परिसर में कार्यरत हर व्यक्ति, जो दवा वितरण प्रक्रिया में शामिल है, फार्मासिस्ट रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ राज्य फार्मेसी काउंसिल में पंजीकृत हो।

RDCA की चेतावनी — “कानून की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं”

रीटेल डिस्ट्रीब्यूशन केमिस्ट्स अलायंस (RDCA) ने अपने सदस्यों को भेजे गए परिपत्र में कहा है कि हाल के DPC निर्देशों के बाद फार्मासिस्ट की अनुपस्थिति में दवा वितरण (dispensing) करना न केवल लाइसेंस निलंबन का कारण बनेगा, बल्कि संबंधित व्यक्ति को कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा।

RDCA के अध्यक्ष ने कहा—

“फार्मेसी कानूनों का पालन हर केमिस्ट की जिम्मेदारी है। हम अपने सदस्यों को बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि किसी भी स्थिति में बिना पंजीकृत फार्मासिस्ट के दवा वितरित न की जाए। आने वाले समय में औषधि निरीक्षक (Drug Inspectors) और फार्मेसी काउंसिल के अधिकारी बिना सूचना के निरीक्षण कर सकते हैं।”

यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब कई छोटे-मोटे मेडिकल स्टोर्स अपने व्यवसाय में प्रशिक्षित या पंजीकृत स्टाफ की बजाय गैर-तकनीकी कर्मचारियों से दवा वितरण करवा रहे हैं — जो कि सीधे तौर पर फार्मेसी एक्ट का उल्लंघन है।

जन विश्वास अधिनियम के बाद फार्मेसी सेक्टर में अनुशासन

जन विश्वास अधिनियम, 2023 ने देश के औषधि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाया है। इसके तहत कई पुराने कानूनों में संशोधन कर अनुपालन आधारित (compliance-based) प्रणाली को मजबूत किया गया है। फार्मेसी एक्ट में जोड़े गए नए प्रावधानों ने इस बात को अनिवार्य बना दिया है कि—

  • प्रत्येक फार्मेसी में एक पंजीकृत फार्मासिस्ट की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।

  • हर शिफ्ट में फार्मासिस्ट का नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर और उपस्थिति रजिस्टर में दर्ज हो।

  • निरीक्षण के दौरान यदि कोई उल्लंघन पाया गया, तो उसका रिकॉर्ड स्वचालित रूप से राज्य औषधि नियंत्रक (State Drug Controller) और फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को भेजा जाएगा।

यह सुधार औषधि सुरक्षा (Drug Safety), पारदर्शिता (Transparency) और उपभोक्ता संरक्षण (Consumer Protection) के तीन मूलभूत स्तंभों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

DPC की सख्ती क्यों ज़रूरी हो गई है?

हाल ही में हुई खांसी सिरप से संबंधित मौतों और गुणवत्ता जांच रिपोर्टों ने भारत की फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
ऐसे में, दिल्ली फार्मेसी काउंसिल का यह कदम रोकथाम आधारित नियमन (Preventive Regulation) के रूप में देखा जा रहा है।
DPC के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार—

“फार्मासिस्ट की भूमिका केवल दवा देने तक सीमित नहीं है। वह रोगी को उचित दवा, सही खुराक और संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी देने में भी अहम योगदान देता है। जब यह प्रक्रिया गैर-तकनीकी व्यक्ति के हाथ में जाती है, तो यह सीधे रोगी की सुरक्षा से समझौता है।”

भारत में फार्मेसी सेक्टर की वर्तमान स्थिति

भारत में लगभग 10 लाख से अधिक पंजीकृत फार्मासिस्ट हैं, जबकि देशभर में संचालित 8 लाख से अधिक रिटेल फार्मेसी स्टोर्स हैं।
इनमें से कई छोटे शहरों और कस्बों में संचालित स्टोर्स में योग्य फार्मासिस्ट की स्थायी उपस्थिति नहीं पाई जाती।
नियामक संस्थान लंबे समय से इस पर चिंता जता रहे थे कि बड़ी संख्या में मेडिकल स्टोर्स फार्मासिस्ट के लाइसेंस का दुरुपयोग करते हुए उनके नाम से संचालन कर रहे हैं, जबकि वास्तविक नियंत्रण गैर-तकनीकी व्यक्तियों के हाथों में है।

इस पर रोक लगाने के लिए अब DPC और RDCA मिलकर एक “Compliance Task Force” गठित करने की योजना बना रहे हैं, जो क्षेत्रवार निरीक्षण करेगी और रिपोर्ट तैयार करेगी।

फार्मासिस्टों और विशेषज्ञों की राय

दिल्ली स्थित वरिष्ठ फार्मेसी विशेषज्ञ कहते हैं —

“यह निर्णय भले सख्त लगे, लेकिन दीर्घकाल में यह जनता के हित में है। फार्मासिस्ट एक प्रशिक्षित स्वास्थ्य पेशेवर होता है, जिसे दवा विज्ञान (Pharmacology) और रोगी सुरक्षा की गहरी समझ होती है। अगर यही जिम्मेदारी गैर-तकनीकी व्यक्ति निभाएगा तो इससे न केवल उपचार की गुणवत्ता घटेगी, बल्कि दवा प्रतिरोध (Drug Resistance) जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।”

वहीं, एक निजी मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर कहती हैं—

“जन विश्वास अधिनियम के बाद फार्मेसी कानूनों में जो बदलाव हुए हैं, वे सिर्फ सजा के लिए नहीं बल्कि व्यावसायिक मानकों को ऊँचा उठाने के लिए हैं। अब समय आ गया है कि केमिस्ट समुदाय इसे सुधार के अवसर के रूप में ले, न कि बोझ के रूप में।”

कैसे सुनिश्चित करें अनुपालन — केमिस्टों के लिए गाइडलाइन

RDCA ने अपने परिपत्र में फार्मेसी मालिकों के लिए विस्तृत गाइडलाइन भी साझा की है:

  1. हर फार्मेसी में पंजीकृत फार्मासिस्ट की ड्यूटी शिफ्ट वाइज तय करें।

  2. फार्मासिस्ट की अनुपस्थिति में किसी भी दवा का वितरण न करें।

  3. फार्मासिस्ट का नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर स्टोर में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करें।

  4. दवा वितरण का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल लॉगबुक में दर्ज करें।

  5. निरीक्षण के दौरान सभी दस्तावेज उपलब्ध रखें — फार्मेसी लाइसेंस, स्टाफ की योग्यता, उपस्थिति रजिस्टर आदि।

इन मानकों का पालन न करने पर न केवल लाइसेंस निलंबन बल्कि कानूनी कार्रवाई भी संभव है।

राष्ट्रीय स्तर पर फार्मेसी सुधार की दिशा

दिल्ली फार्मेसी काउंसिल की यह पहल राष्ट्रीय स्तर पर अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल गाइडलाइन बन सकती है।
फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) पहले ही संकेत दे चुकी है कि आने वाले समय में सभी राज्यों में फार्मासिस्ट उपस्थिति के रियल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लागू किए जाएंगे।

इस सिस्टम के तहत:

  • हर फार्मासिस्ट की उपस्थिति को बायोमेट्रिक या ऐप आधारित लॉगिन के माध्यम से सत्यापित किया जाएगा।

  • किसी भी अनियमितता की स्थिति में स्वचालित अलर्ट संबंधित राज्य काउंसिल को भेजा जाएगा।

  • इससे “फार्मासिस्ट ऑन पेपर” की प्रथा पर भी लगाम लगाई जा सकेगी।

आगे की राह — पारदर्शिता और पेशेवर जवाबदेही की ओर

फार्मेसी सेक्टर, जो लंबे समय से “मुनाफे” और “सुविधा” के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा था, अब एक निर्णायक मोड़ पर है।
RDCA और DPC की संयुक्त चेतावनी ने स्पष्ट कर दिया है कि अब फार्मेसी का संचालन केवल व्यापार नहीं, बल्कि एक स्वास्थ्य सेवा (Healthcare Service) के रूप में देखा जाएगा।

अगर यह सख्ती निरंतरता के साथ लागू की जाती है, तो—

  • दवा गुणवत्ता में सुधार होगा।

  • दवा गलत उपयोग (Misuse) और प्रतिरोध (Resistance) कम होंगे।

  • उपभोक्ता विश्वास बढ़ेगा।

  • और फार्मासिस्टों की पेशेवर भूमिका समाज में अधिक सम्मानजनक बनेगी।

निष्कर्ष (Conclusion):

DPC के सर्कुलर और RDCA की चेतावनी ने भारत के औषधि क्षेत्र को एक गंभीर आत्ममंथन का अवसर दिया है।
यह केवल नियमों की बात नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य सुरक्षा (Public Health Safety) की मूल भावना से जुड़ा कदम है।
भविष्य में, यदि सभी फार्मेसी संस्थान इस दिशा में सजगता से कार्य करें, तो न केवल दिल्ली बल्कि पूरे भारत में दवा वितरण प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाया जा सकता है।

अगर आप खांसी सिरप से संबंधित विवाद की अधिक जानकारी चाहते है ताे ये पढ़ें

संदर्भ (References):
  1. Pharmabiz India, “DPC issues circular on Pharmacy Act compliance,” October 2025.

  2. The New Indian Express, “Delhi Pharmacy Council cracks down on unlicensed dispensing,” October 2025.

  3. RDCA Internal Circular, October 2025.

  4. Pharmacy Act, 1948 (as amended by Jan Vishwas Amendment Act, 2023).

  5. Interviews with Dr. Naveen Mathur & Dr. Sushma Agarwal (2025).

Disclaimer

यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) नहीं है। किसी भी चिकित्सा निर्णय के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।

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